07निजता

हम सब को निजता का अधिकार है और अपने प्रतिष्ठा पर लगे आरोपों का जवाब देने के लिए हम सक्षम हैं, लेकिन सार्वजनिक हित के लिए किसी भी समीक्षा से परहेज नहीं करेंगे

निजता क्या हैजन हित क्या है?

हमारा आठंवां मसौदा सिद्धांत मुख्य अच्छे कारणों को पहचानता है कि हमारे ऐसे कौन से वे निजी मामले हो सकते हैं जो कि जन हित भी हो सकते हैं। फिर सवाल उठता है कि निजता क्या है और जन हित क्या हैं? उत्तर बहुत सरल नहीं है।

सभी प्रचलित मानव सभ्यताओं में कुछ हद तक निजता का भान होता है किंतु निजता की परिभाषा समय और स्थान के अनुसार अलग अलग हो सकती है। रोम के प्राचीन शहर इफेसस में संभा्रत व्यंक्ति एक साथ शौच किया करते थे। समकालीन जर्मनी में सार्वजनिक स्थलों पर नग्नता स्वीकार्य है जबकि अधिकतर देशों में ऐसा नहीं है।  यहां पर यह देखने के लिए क्लिक करें कि आपके देश में निजता का क्या अर्थ है।

पूर्ण परिदृश्य में अधिकतर देशों में अमेरिका की तुलना में निजता की वृहद परिभाषा है तथा इसे बचाने के लिए वे मुक्त अभिव्यक्तियों को करने के लिए भी तत्पर रहते हैं। फ्रांस के एक न्यायालय का 1970 से एक निर्णय वृहद रूप से कहता है कि देश के नागरिक कोड का निजता का नियम ’ किसी व्यक्ति के नाम, किसी की छवि, उसकी अतरंगता, किसी के सम्मान तथा प्रतिष्ठा, किसी की आत्मकथा तथा किसी के भूले पिछले संबंधों के अधिकारों’ की रक्षा करता है। डोमिनिक स्ट्राॅस काह्न इससे बहुत ही खुश हो सकते हैं। किन्तु क्या यह वाकई जन हित में नहीं होगा कि फा्रंस के मतदाताओं को यह जानने का अधिकार है कि उनके राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार का महिलाओं के सम्बंधों के साथ क्या इतिहास रहा है?

फिर भी जन हित के क्षेत्रों पर काफी बहस हो सकती है। सनसनीखेज टेब्लॉइड समाचारपत्रों के संपाउक तथा गपशप करने वाली वेबसाइटें अपने नए नए समाचारों से किसी फुटबॉल खिलाड़ी या पाॅप स्टार के निजी जीवन के बारे में तरह तरह की बाते बता सकते हैं। किंतु जन हित का मतलब जनता की रूचि नहीं या मजा नहीं होता तथा इस प्रकार समाचार पत्र बिकते हैं और वेबसाइट पर ज्यादा से ज्यादा लोग जाते हैं।  अगर इन दोनों की बात की जाए तो मशहूर शख्सियतों की तो कोई निजी जिंदगी बचेगी ही नहीं क्योंकि हमारे समाज का एक तबका उनके जीवन के हर पल में झांकने के लिए बेताब रहता है। तो यहां पर बहुत ही एक रोचक चर्चा है कि यहां पर जन हित से क्या तात्पर्य है। सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों के साथ जाहिर तौर पर ज्यादा पूछताछ की जाती है बजाय आम इंसानों के। इससे भी आपको यह पता चल सकता है कि सार्वजनिक जीवन कौन जी रहा है।

और जब तक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सवाल है, तो संदर्भ ही सब कुछ है। यदि मैं किसी ऐसे साथी के साथ यौन संबंध स्थापित करता हूं जो कि सामाजिक रूप से मेरा जीवनसाथी नहीं है तो यह मेरा निजी मामला है। यदि मैं एक पुजारी हूं और शादी की पवित्रता के बारे में लगातार बाते करता रहता हूं तो यह जन हित में आता हे। यदि एक रक्षा मंत्री किसी से प्रेम करता है तो यह उसका निजी मामला है किंतु यदि उसका प्रेमी किसी दुश्मन राज्य का एजेंट है तो जाहिर तौर पर यह जन हित का मामला है।  यदि मेरे किसी तेल की कम्पनी में शेयर हैं तो यह मेरा अपना काम धधंा है लेकिन मैं यदि सरकार में ऐसे पद पर काम करता हूं जहां पर मैं तेल कंपनियों को आकर्षक अनुबंध करा सकता हूं तो यकीनन यह जन हित का मामला है लेकिन मेरे अन्य निवेश नहीं। यदि मुझे कोई बीमारी है जिसकी वजह से मैं गणित के सवाल नहीं कर सकता हूं तो यह सिर्फ मेरी ही समस्या है किन्तु यदि मैं शहर के कोषाध्यक्ष के रूप में काम कर रहा हूं तो यह जन हित का मामला बन जाएगा, ( लेकिन सिर्फ मेरे ही शहर के लोगों के लिए न कि पूरे संसार के लिए)। इसी प्रकार यदि मैं स्कूल या विश्वविद्यालय में पढ़ाई में खराब अंक पाता था तो यह मेरी समस्या है किन्तु यदि मैं देश के सिरमौर के रूप में चुनाव लड़ रहा हूं तो वाकई में यह जन हित का मामला है।

कई सारे व्यक्तिगत निर्णय आपको हर पल मिल जाएंगे लेकिन कानून के न्यायालय के द्वारा नहीं बल्कि संपादकों, कर्मचारियों, शिक्षकों, चिकित्सकों तथा हम सब के द्वारा। लेकिन मूल सिद्धांत जटिल नहीं होना चाहिए। हर मामले में हम जन हित के खिलाफ निजता का संतुलन रखते हैं।

श्निजता मृत है। इससे पार पाइएश्

इंटरनेट के युग ने हालांकि उन परिस्थितियों में मूलभूत परिवर्तन कर दिया है जिसमें हम संतुलन बनाने का प्रयास करते हैं। आज से लगभग 40 वर्ष पहले व्यक्ति की निजी सूचनाएं एक या दो धूल धूसरित कागज की प्रतियों में ही सिमटी रहती थी अब वे इलैक्ट्रोनिक रूप से जमा होती रहती है और अगर आप सजग हैं और तकनीक का प्रयोग करने वाले हैं और कई और साधनों का प्रयोग करते हैं। इसके अतिरिक्त आंकड़ों का एक नया संसार है जो कि आज से 40 साल पहले नहीं होता था जैसे आपका आॅन लाइन इतिहास, आपका मोबाइल फोन आपकी जगह का पता लगा लेता है, आपके ईमेल, आपके के्रडिट कार्ड का पूरा विवरण आदि। अमेरिका की बेहद ही आम सूचनाओं के भंडार करने वाली कम्पनी एक्सिकॉम में जो कि कॉन्वे, अर्कान्सस में कार्यरत है में 96प्रतिशत अमेरिकियों के घरेलू आंकड़ें तथा लगभग पूरे संसार के आधा बिलियन लोगों के आंकड़े हैं।

एक विकसित देश के एक आम नागरिक का कम्प्युटर में जमा हुई कोई भी व्यक्तिगत सूचना जॉर्ज ऑर्विल के बिग ब्रदर की कल्पनाओं से भी अधिक होती है। ये सभी सूचनाएं आपको आपकी आवश्यकताओं के अनुसार व्यक्तिगत विज्ञापन तथा सेवाएं देने के लिए निजी कम्पनियों को भेजे जाते हैं तथा साझा किए जाते हैं और एक व्यावसायिक उत्पाद की तरह भी प्रस्तुत करते हैं। आप न सिर्फ प्रयोक्ता होते हैं बल्कि आपका प्रयोग भी होता है। मेटा फिल्टर वेबसाइट पर एंड्रयु लुईस ( ब्लु बीटल के अंतर्गत) लिखते हैं कि यदि आप किसी के लिए कुछ चुका नहीं रहे हैं तो आप ग्राहक नहीं हैं बल्कि बेचे जाने वाले उत्पाद हैं।

तकनीक के अत्यधिक प्रचार प्रसार ने कई बार शर्मिंदा कर देने वाली स्थितियों को भी उत्पन्न किया है। गूगल के स्ट्रीट व्यु ने कई महिलाओं को उनके अर्पाटमेंट की छतों पर धूप का आनंद उठाते हुए देखा क्योंकि उन्हें लग रहा था कि वे अकेली हैं। गूगल और फेसबुक ने तो चेहरे को पहचानने की एक तकनीक विकसित की है जो कि एक जैसे चेहरे को  ऑनलाइन एक साथ जोड़ सकता है। मोबाइल फोन में जीपीएस लोकेशन सिस्टम तथा रेडियो फ्रीक्वेंसी आइडेंटीफाइर टैग जैसे लंदन का ओयेस्टर यातायात भुगतान कार्ड से मतलब है आपकी ऑनलाइन गतिविधियों का कहीं से भी पता लगाया जा सकता है।

यहां तक कि संसार के सबसे स्वतंत्र देशों में कुछ सूचनाओं को एकत्र किया जाता है तथा उसे सरकारी संस्थाओंद्वारा साझा किया जाता है जो कि कभी नागरिकों को आतंकवादियों से, गैंगस्टर तथा माफियाओं से सुरक्षित रखने के लिए इस ध्रष्टता को ढाकने के लिए अपनी अतिसाधारण शक्तियों का प्रयोग करते हैं। ब्रिटेन के संवाद की पाबंदी आयुक्त बतलाते हैं कि 2010 में संवाद आंकड़ों के लिए विभिन्न सार्वजनिक प्राधिकरणों से 552,550आवेदन प्राप्त हुए थे जो कि सर्तकता तथा सुरक्षा सेवाओं से लेकर स्थानीय नगर परिषदों तक थीं। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के इंटरनेट विशेषज्ञ इआन ब्राउन इस पर टिप्पणी करते हैं। (वीडियों के लिए यहां लिंक पर क्लिक करें। )

गूगल ने अपनी गोपनीयता रिपोर्ट में पूरे संसार से पाने वाले ऐसे आवेदनों की श्रेणी को बतलाने की कोशिश की थी। किन्तु अमेरिका में राष्ट्रीय सुरक्षा आदेश से सम्बंधित एक श्रेणी है जो इंटरनेट सेवा प्रदाताओं को ऐसे विशिष्ट प्रयोक्ताओं के बारे में सूचना बताने के लिए बाध्य किया जाता है तथा उन्हें इस आदेश को बतला कर ऐसी सूचनाएं देने के लिए बाध्य किया जाता है। जब मैने 2011 की गर्मियों में फेसबुक और ट्विटर के कानूनी अधिकारियों से बात की तो मैने पूछा कि ’ लेकिन क्या आप मुझे बता सकते हैं कि आपको लगभग ऐेसे कितने आवेदन प्राप्त होते हैं।’। उन्होंनें निराशा और गुस्से से कहा ’नहीं’ वे मुझे यहां तक कि ये भी नहीं बता सकते।

एक महत्वपूर्ण भाव में ये निजी तथा सार्वजनिक शक्तियां आपके बारे में आप से भी ज्यादा जान सकती हैं। आप तो हो सकता है कि अपने अतीत के बारे मे या तो भल चुके हों या बहुत ही कम याद हो और खास तौर पर इंसान की आदत होती है कि वह खुद को शर्मिन्दा करने वाली बातों को भूलन ज्यादा पसंद करता है। लेकिन कम्प्युटर इन सबको याद रखता है। और वो भी आपके फेसबुक, रेनरेन , व्कोटंटेक या और किसी सोशल मीडिया में आप के इन सब बातों को अपलोड करने से काफी पहले ही कम्प्युटर के पास ये सारी सूचनाएं होती है।

सन माइक्रोसिस्टम्स के सिलिकॉन वैली के प्रमुख अधिकारी स्काॅट मैकनिली ने कथित रूप से यह अजीब सा निष्कर्ष निकाला था कि ’निजता मृत समान है। इससे पार पाएं। उनके अन्य कई कथनों की ही भांति हो सकता है कि उन्होने यह नहीं कहा हो लेकिन इस टिप्प्णी की मूल भावना यही थी इससे इंकार भी नहीं किया जा सकता।

इसका अर्थ समझने के लिए कुछ उदाहरण लेते हैं। अमेरिका में रटगर्स विश्वविद्यालय के एक विद्यार्थी, टाइलर क्लेमेंटी को चोरी से उसके कमरे में रहने वाले दूसरे लड़के ने अपने कैमरे में कैद कर लिया था जब वह किसी किसी अन्य लड़के के साथ अतरंग हो रहा था। उस लड़के के उस साथी ने इस वीडियों को अपने कम्प्युटर के वेब कैम ऑनलाइन से फिल्माया था जिससे उसकी यह गतिविधि पूरा संसार देख रहा था। परूशान टाइलर ने जॉर्जवाशिंगटन पुल से हडसन नदी में छलांग लगा दी और खुद को मार लिया। (फेसबुक पर उसका विदाई संदेश था ’जार्ज वाशिंगटन पुल से कूद रहा हूं। मुझे क्षमा करें।) चीन में भी इन तथाकथित मानव विस्तार खोज इंजनों ने वांग यू नाम की एक महिला को पहचाना और फिर उसके पीछे ही पड़ गए जिसे उसके किसी मित्र ने बिल्ली के बच्चे को अपनी ऊंची एड़ी के सैंडलों से मार रही थी। जब गूगल ने अपनी सामाजिक नेटवर्किंग साइट बज़ की शुरूआत की तो हैरिएट जैकेब्स के नाम से जानी जाने वाली एक महिला ने जो कि अपने उत्पीडक अभिभावकों तथा पति से छिप कर रह रही थी, अपने सारे व्यक्तिगत आवश्यक सम्पर्क अपने जीमेल खाते से पा लिए जो कि उसने दूसरों के साथ साझा किए थे। उसने अपने छद्मनामी ब्लाग में लिखा कि ’मेरी निजता कोई पुरानी घिसीपिटी सोच नहीं है। बल्कि वह मेरी वास्तविक शारीरिक सुरक्षा से जुड़ी है।’

हम इस बारे में क्या कर सकते हैं?

क्या हम इसे निपटा कर खूश हैं? यदि नहीं तो हम इस के बारे में आखिर क्या कर सकते हैं? जब आप किसी ऑनलाइन या मोबाइल सुविधा पर पंजीकरण करते हैं तो आप शर्तें तथा परिस्थितियों के नाम से जानी जाने वाले एक छोटे प्रिंट वाले कानूनी दस्तावेजों पर ’स्वीकार है’ बटन पर शर्तिया क्लिक कर देते हैं। क्या आप इन्हें पढ़ने के लिए रूके हैं? मुझे तो ऐसा नहीं लगता। और अगर हमने भूल कर उसे कभी पढ़ा भी होगा तो उसमे इतनी कानूनी पेचीदगी वाले शब्द होते हैं कि हमें समझ में ही नहीं आता। (मुझे पता नहीं कि ये इस वेबसाइट पर भी लागू होते हैं लेकिन हमने अपनी निजतर नीति को हर संभव तरीके से बताया है। ( लिंक डालें ) )

अगर हमें लगता है कि बोलने की स्वतंत्रता ( और साथ एक अच्छे समाज में) में हमें कुछ निजता की आवश्यकता होगी तो हमें यह समझना होगा कि हम कितनी निजता को खो रहे हैं तथा यदि हम इसके बारे में कुछ नहीं सोचते हैं तो इसका पतंगड़ बनाना। यहां तक कि यदि ये सेवा प्रदाता आपके देश में बाजार के काफी बड़े हिस्से में छाए हैं तो भी वे आपके ही व्यवसाय पर ही निर्भर है। और उनमें से कुछ, कुछ समय के लिए जन दबाव के चलते जवाब देते हैं। एक जन आंदोलन ने गूगल को उसके बज़ नेटवर्क को बंद करने तथा उसे सुधार कर गूगल$ के रूप में नई खासियतों के साथ लाने के लिए विवश किया वहीं पर फेसबुक को इसकी बेकन वाले विज्ञापन सिस्टम को वापस लेने के लिए बाध्य किया।

आपके पास तुलनात्मक रूप से कई सारे तकनीकी उपाय होते हैं जो आप अपने उन आंकड़ों की संख्या को कम करने के लिए प्रयोग कर सकते हैं जोकि इन दोनों राज्य संस्थाओं द्वारा हासिल किया जाता है तथा जिसे साइबर विशेषज्ञ जैरॉन लैनियर अग्रसक्रिय रूप से ’जासूसी / विज्ञापन साम्राज्य’ कहते हैं जैसे गूगल तथा फेसबुक। इन आलोचनाओं के लिए बहुत ही छोटी प्रतिक्रिया देते हुए गूगल और अन्य खोज इंजनों नें लोगों को खोज का एक और अस्पष्ट प्रारूप प्रदान किया है। इस क्षेत्र में अगंणी संस्था इलैक्ट्रॉनिक फ्रंटियर फाउंटडेशन ने एचटीटीपीएस नाम से एक फायरफॉक्स एक्स्टेंशन को हर जगह के लिए तैयार किया है जो आपके संवादों को मुख्य वेबसाइटों के साथ कूटबद्ध करता है। आप अपनी निजता को ऑनलाइन सुरक्षित रखने के लिए टाॅप नामक मुफ्त सॉफ्टवेयर को प्रयोग कर सकते हैं।

फेसबुक तथा भूलने का एक अधिकार

लेकिन क्या आपने कभी अतीत में अपने बारे में चीजों को साझा किया है जो कि आप चाहते थे कि न की जाए। उदाहरण के लिए फेसबुक पर अपने निजी फोटों को देखें। (फेसबुक अब संसार का सबसे बड़ा फोटो एल्बम है।) मान लीजिए कि आप अपनी किशोरावस्था के उन ज्यादा अजीबोगरीब जिंकों से शर्मिंदा होते हैं। मान लीजिए कि आपको डर है कि आप को किसी विश्वविद्यालय में जगह नहीं मिलेगी या नौकरी नहीं मिलेगी क्योंकि सोशल साइट पर क्या है। क्योंकि हम सभी जानते हैं कि नियोक्ता तथा विश्वविद्यालय अपने आवेदकों के बारे में सब कुछ जानने के लिए ऑनलाइन खोज करते हैं। आप क्या कर सकते हैं?

अधिकारों तथा दायित्वों के बारे में फेसबुक का वर्तमान वक्तव्य कहता है कि आपके फोटो तो आपकी ही बौद्धिक सम्पत्ति बने रहेंगे लेकिन आपने हमें अर्थात फेसबुक को एक अतिविशिष्ट, हस्तान्तरणीय, उप लाइसेंसीकृत रॉयल्टी मुक्त, पूरे संसार में कहीं भी किसी भी आई पी घटक को प्रयोग करने का अधिकार प्रदान किया है जो आप पोस्ट करते हैं या फेसबुक के लिंक में हैं (आईपी लाइसेंस)। यह आई पी लाइसेंस तब खत्म हो जाता है जब आप उस आईपी घटक या अपने खाते को खत्म करते हैं जब तक कि आपके घटक किसी और के साथ जुड़े हुए नहीं होते तथा उन्होंने उसे नहीं हटाया हो। (माई इलैक्ट्रॉलिक्स )। इसलिए हां आप अपनी पोस्ट को हटा सकते हैं लेकिन यदि वे शर्मिंदा करने वाले फोटो आपने अपने मित्रों के साथ साझा किए हुए हैं तो अगर आपने वे अपने फोटो हटा भी दिए हैं तो ऐसे फोटो फिर भी वहां पर रहेंगे। पंडोरा बाॅक्स को बंद करना ज्यादा सरल होगा।

क्या इसे सरल बनाया जाए? क्या एक विशिष्ट ’भूलने का अधिकार’ होना चाहिए? यदि हां जो यह किस किस पर लागू करना चाहिए। उदाहरण के लिए जर्मनी में एक नियम है जो कहता है कि समय की एक निश्चित अवधि के बीत जाने के बाद किसी भी व्यक्ति के पिछले आपराधिक मामलों की सिद्धि नहीं हो सकती है। जर्मनी में 1945 के उपरांत इन व्यक्तियों को एक नई शुरूआत करने का मौका मिलना चाहिए था। जर्मन नागरिकों के लिए वकीलों नें गूगल का उनके पुराने अपराधों की सार्वजनिक रिपोर्ट के खिलाफ पूरे संसार में गूगलडॉट कॉम पर दिए जाने के लिए विरोध किया तो गूगल ने प्रतिरोध किया।

निजता तथा आंकड़ों की सुरक्षा के संबंध में युरोपीयन युनियन संसार की सबसे प्रभावशाली शर्त निर्धारक है। निजता के लिए आदर्श मानक के निर्धारण को करने के रूप में इसके सूचना संरक्षण निर्देश को बनाया गया है। 2012 में सह एक संशोधित सूचना संरक्षण व्यवस्था के लिए एक प्रस्ताव के साथ आ रही है जो कि यहां पर हुए कई तकनीकी अविष्कारों को ध्यान में रखते हुए बनाए गए हैं और साथ ही भूलने के अधिकार के घटक को भी प्रस्तुत करेगा। हम इस पर बहस करेंगे जैसे ही वह अस्तित्व में आएगा।

हम बाहर जाते हैं और लोगों के जीवन को नष्ट करते हैं। 

निजी जीवन के सार्वजनिक प्रकटन के जाहिर नुकसान वही है जो कि मास मीडिया के माध्यम से करोड़ों लोगों तक पहुंचते हैं। 2011 की गर्मियों में ब्रिटेन एक ऐसे आरोपों की कड़ियों से हिल गया था जिसमें रूपर्ट मुरदोच द्वारा चलाया जाने वाले समाचारपत्र ने गैरकानूनी रूप से कई विख्यात हस्तियों, शाही व्यक्तियों के तथा यहां तक कि अपराधियों की जानकारी को हासिल करने के लिए उनके फोन टैप हो गए थे। लेकिन यदि आपराधिक तरीके भी इस्तेमाल नहीं भी किए गए थे फिर भी फिल्मी सितारों, फुटबालरों तथा अन्य प्रसिद्ध हस्तियों के निजी जीवन में नियमित अनुचित दखल दिया गया था। यहां पर कहने की जरूरत नहीं है कि जो लोग इस विशिष्ट कहानी में संलग्न हो गए थे वे जन हित को न्यायोचित नहीं ठहरा पाए। मुदरोह के हैकिंग प्रकटन के चलते कई विख्यात हस्तियों को जैसे कि लेखिका जे के राउलिंग से लेकर फिल्मी कलाकार हुग ग्रांट तो प्रभावित हुए ही साथ ही ऐसे अभिभावक जिनके बच्चों का कत्ल हुआ था तथा जिनके बच्चे खो गए थे वे भी ये बताने के लिए पंक्तिबद्ध हुए कि किस तरह मीडिया ने उनके निजी जीवन में अनावश्यक हस्तक्षेप किया। मुदरोच द्वारा संचालित विश्व के समाचार पत्र के भूतपूर्व समाचार संपादक ने कथित रूप से अपने संवाददाताओं से कहा था कि यह वह है जो हम करते हैं हम बाहर जाते हैं और लोगों के जीवन को नष्ट करते हैं। हम इसे अगले सिद्धांत में आपकी छवि की रक्षा करने के बारे में पढ़ेंगें। (पी9 के लिए सूत्र )।

जब उन प्रभावित व्यक्तियों ने उनकी निजता के अधिकार को बतलाते हुए उन प्रकाशनों को बंद कराने के लिए समाचार पत्र के संपादकों के सामने विरोध किया तो उन्हे सुनना पड़ा कि ये उनकी वाणी की स्वतंत्रता पर बाधित करने का प्रयास है। कभी कभी यह सच होता हैः अमीर तथा शक्तिशाली लोग (खास तौर से संगठन) उन तथ्यों को भी जाहिर नहीं होने देना चाहते जिसे जनता को पता होना चाहिए। अक्सर यह होता है जिसे जिसे संपादक जन हित की संज्ञा देते हैं वह उस से ज्यादा नहीं होता जो जनता के मजे के लिए होती है। युरोप में न्यायालय को धारा 8 द्वारा प्रदान निजता के अधिकार के खिलाफ युरोपियन कन्वेंशन आॅन ळ्युमेन राइट की धारा 10 में प्रदान बोलने के अधिकार में संतुलन स्थापित करने के लिए व्यक्तिगत निर्णय लेना पड़ा था।

लेकिन क्या इस समस्या को समाधान के लिए किसी भी घटना के उपरांत न्यायालय पर छोड़ देना चाहिए? जब तक हम ऐसे समाचारपत्रों को खरीदते रहेंगे या फिर ऐसी विवादास्पद वेबसाइटों को देखते रहेंगे तो हम इस दुव्र्यवहार को प्रोत्साहित करते रहेंगे। अगर हम सैद्धांतिक रूप से तो विरोध करेंगे लेकिन इनमें रूचि लेकर पढ़ेंगे तो हम भी पाखंडवादी है। एक इलैक्ट्रॉनिक पत्रिका स्लेट का संपादक मिशेल किन्स्ले अपने अनुभवों को कुछ युं बताता है कि जब उसे बिल क्लंकिटन के मोनिका लेंवेंस्की के साथ नाजायज संबंधों के बारे में विरोध्धात्मक ईमेल मिला करते थे तो ’पाठकों के ईमेल तो न करते थे लेकिन उनके माउस हां पर ही क्लिक करते थे। ’

इसलिए वाणी की स्वतंत्रता के क्षेत्र में भी जो भी होता है वह न सिर्फ सरकार पर बल्कि न्यायालय तथा नियमों पर भी निर्भर करता है। यह हम पर भी निर्भर करता है कि हम क्या करते हैं। हम इन समाचार पत्रों को पढ़ना बंद कर सकते हैं, उन वेबसाइटों पर जाना बंद कर सकते हैं तथा सामाजिक मीडिया में सूचनाएं देना बंद कर सकते हैं। हम अपनी निजता सेटिंग को कस सकते हैं तथा बेहतर की मांग कर सकते हैं। यहां तक कि एक संसार परिवर्तित होता है तथा संवाद की एक नई तकनीक को खोलता है तथा हमारी निजता न सिर्फ एक जरूरी सीमा में रहनी चाहिए बल्कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए भी स्थिति है।


Comments (17)

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  1. If religion were just a matter of recognizing a particular prophet and performing particular private rituals then this formulation would be pretty good.

    One man is a Jew and recognizes the prophet Moses. He prays to a God whom he takes to be the only God.

    A Christian is much the same except that he replaces Moses with Jesus.

    A Muslim replaces Jesus with Mahommed.

    And a Hindu recognizes thousands of Gods.

    But it’s not at all like that; it’s not at all private.

    A little while ago young Muslim men frequented the beaches in southern Sydney and approached the girls in their swimming costumes and told them they were “sluts” and “whores.” When the lifesavers told them to cool it they bashed the lifesavers. The lifesavers! Bashing lifesavers is more aggressive towards the society-as-a-whole than defecating on the tomb of the unknown soldier.

    And eventually there were huge battles between groups of Muslim and non-Muslim young men.

    It is not just a matter of private prayer. It is a matter of what behaviour and practices are allowed in public. It is a matter of raising money to support the ISIS in Syria and Iraq.

    It is a matter of establishing schools to segregate your kids, and in other ways brainwashing and them.

    And it is a matter of killing people who write things about your prophet that hurt your feelings. Ask the writers and film makers who can’t go to the shops without an armed guard.

    Since certain religions have embraced modernity and since others (one at least) are determinedly medieval, I don’t think that we can “rub along.” Sooner or later the determinedly medieval lot will do enough things like flying airplanes into the World Trade Centre that a civil war will break out. There will be people like Neville Chamberlain who will pompously announce “peace in our time,” but there can be no peace.

  2. I agree with imos. It is freedom that is at issue here, not respect. Parsing respect into two different forms, “recognition respect” and “appraisal respect” is leads away from a full understanding what is actually at stake.

    Misplaced respect can be a very dangerous thing. As an extreme example, say I am walking down the street with a friend, and we happen upon someone being beaten. At my urging, we jump to his aid, and pull his attacker away, and restrain the attacker. Another bystander calls the police. Meanwhile, the person who was being attacked, pulls a gun from his pocket, and shoots both his attacker, and my friend, wounding the attacker, and killing my friend. He also fires a shot at me, but it misses. Then he gets up and runs away.

    Before the police arrive the “attacker” who I no longer need to restrain, because he is wounded, says to me with a world weary sadness, that the other guy had threatened to rob him, and he was in the process of defending himself, when me and my friend showed up and intervened, on the would be robbers behalf.

    Who exactly deserves respect in this case? Me? My friend? No. Only the guy laying on the ground with the bullet in him. And who is free? Me? No, I’m going to be talking to the police for a while, and living with the guilt of my friend’s death for the rest of my life. The misunderstood “attacker”? No. He’s going to the hospital, and will be paralyzed for the rest of his days, because the bullet nicked his spinal cord. My dead friend? Nope, not really. Although some would say that death is a kind of freedom, I suppose.
    The only free person among us is the robber, who by the way is never caught for this crime. In the real world, there is no such thing as “recognition respect” In this usage of the word respect, there are two possible meanings: “Esteem for or a sense of the worth or excellence of a person” or “deference to a right, privilege, privileged position, or someone or something considered to have certain rights or privileges”.

    With respect to “respecting the believer, but not the belief, one needs to be careful. Respect need not be granted to everyone. It must be earned. And freedom is a gift, granted to us only by our circumstances. It’s nice to think that one day the world may be a fairer, better place to live. But each of us must decide how much we are willing to do to try and make it so, and be prepared to get sand kicked in your face from time to time, because this world is not perfect, and it never will be.

    Oh, and although I have only today discovered this site, I love it and (almost) everything it stands for! Snap decision? Yes, but that is my style.

  3. No, no, no!

    It’s a fundamental part of my freedom that I shouldn’t have to respect anyone. Force me to respect anyone and you’ve taken my freedom away.

    It may be true that many of us who campaign for free speech do indeed respect many of the people whose beliefs and opinions we disagree with – but we should not be forced to do so. If free speech is to mean anything substantial, then it absolutely should allow us the right to be disrespectful towards the believer as well as towards their beliefs. There is no balancing to be done – this is a point of principle, not something to be bargained away in our quest to be allowed the right to criticise people’s beliefs.

    Tempting as it might be to appease the opponents of free speech by reassuring them that our questioning of their beliefs does not mean we are being disrespectful to them as people, we should never give ground on the principle that we should have the fundamental right to decide for ourselves who we respect and who we do not respect.

    The only way we need to respect the believer is in regard to respecting their freedoms, but that’s more about adhering to the principles of freedom rather than about respecting them as a person.

    Hopefully, most people will choose to be respectful towards the believer – but this should remain entirely an issue of individual choice. Nobody should have an automatic right to our respect – for to enforce such a right would be to take freedom away from everyone else.

    • Hi imos

      thanks for this thoughtful comment. Might your problem with the word ‘respect’ be the definition? Because if we take ‘respect’ at its most basic – accepting that others are different and not wish to harm them – then I cannot see how we can live in a peaceful society without respect. If we are talking about ‘respect’ as a feeling of appraisal, then I absolutely agree with you.

      What are your thoughts on this? If we do not show respect to everyone, how can we uphold the human right that everyone’s dignity is untouchable? I look forward to reading your reply.

      • Hi JB,

        Thanks for replying to my comment!

        I think we should respect other people in the sense that we allow them to have their freedoms – but, as I say, that’s more about respecting a principle than about respecting a person. So long as you allow people their freedoms, then why shouldn’t we be able to live in a peaceful society? The minute someone uses violence, they are taking away someone else’s freedoms, but we can maintain our freedoms without any logical requirement to respect each other.

        As for people’s dignity, I don’t recognise any fundamental human right to maintain one’s dignity. People lose their dignity for all sorts of reasons – usually as a result of their own unprincipled behaviour. If you stick to decent principles, then there’s no reason why your dignity should be harmed by what anybody else does or says.

  4. I agree with the idea of this principle in the sense that every single individual has the right to believe whatever he or she feels like. But I also think that just by promoting this ideal the world is not going to change positively. I believe it is necessary to approach today’s ignorance by fighting it with education, respect, and tolerance. If these methods are used to reinforce the principle I believe attempts to impose ones beliefs or ideologies into others will be reduced, and a more harmonious lifestyle will be achieved. Moreover, I do find some discrepancies within this principle. Just like other individuals have posted and commented, what if the ideology, religion, or belief practiced by an individual or group affects or threatens others? It is stated within the explanation of the principle that we should accept this “one belief” (the principle) above others in other to coexist freely and fight for the higher good. The higher good being that “everyone should be free to choose how to live their own lives, so long as it does not prevent others doing the same.” Well, this sounds kind of comforting, but there is so much to consider. Who or which authorities will provide the guidelines and enforce them? And what type of guidelines? Since something might be insulting for Christians but maybe not for Scientologists. And is Scientology considered a religion? If it is, which ones are not, and how are people following these other religions or ideologies supposed to contribute or express themselves?

  5. This belief is very important because predominant ideas in society can change over time, and we must allow voices to be heard, even if they dissent against commonly held ideals.

  6. I believe that every single person is entitled to their own religious and spiritual belief and others should respect them as believers as well as the content on their belief – as long as it doesn’t cause any harm to those around them.

  7. respecting all religion will result to a better and more tolerant world. I strongly agree with the statement

  8. I think this concept is a nice idea however some theories are insulting and counter productive. If for example, one attempts to justify slavery, the holocaust, discrimination or something of the sort, should the believer be respected?

  9. I don’t know if it is actually possible to commit to this principle. For what do we mean by “respect”? I think the article focuses too much on religion and doesn’t assess other “taboos” related to politics and that are part of collective memory. Is it possible to respect person that believes that Nazism is good and that it should be implemented? What do we think of those people? In many countries you can be charged for saying a statement like that; or among other consequences, people will decide not to speak to that person or to alienate him/her from society. In both cases, there are incentives for an individual not to speak his mind, because his thoughts are not against a specific belief but to other humans. Could we respect a person who thinks like this? Could we trust him or her? Could we be friends with a person that thinks that a race is better than another?
    Humanity witnessed how thoughts like these became politics in the XX century and the lessons were hard to learn. Does allowing an individual to revisit these ideologies represent a risk, that at some point that that horrendous chapter in history can happen again?

  10. Freiheit, und somit auch das Recht zur freien Rede, ist nur moeglich, wenn die Freiheit eines jeden Individuums nur so weit geht, dass sie niemals die Freiheit eines anderen Individuums einschraenkt. Somit existiert keine grenzenlose Freiheit. Fanatische Redner, die dazu aufhetzen, die Freiheit anderer einzuschraenken, sollten keine Redefreiheit geniessen. In diesem Falle respektiere ich weder ‘his content of belief’ noch den ‘believer’.

  11. I think most of the people don’t have the knowledge about other religions and have therefor a hard time to respect religions. Today this principle should be applied world wide as we have more knowledge about the world, its different kinds of people, and their religions. As already mentioned in other comment the past have shown it does not work this way, but let us hope the future will be different.

    • I agree with what Sara is saying. Religion is a difficult topic to discuss. However, it should be the case that when people voice their opinion others must respect it however this does not necessarily mean that they agree!

  12. In my opinion this is a principle that should by applied World wide. Everyone has opinions and everyone should be entitled to one. This does however not mean that everyone should agree but at least people will have the opportunity to express their thoughts. It is all about respecting one another. However, unfortunately as the past has proven this is not always the case and implementing this principle will be one of the most difficult due to factors such as religion.

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'वाक्-स्वतंत्रता पर चर्चा' ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के सेंट एंटनी कॉलेज में स्वतंत्रता के अध्ययन पर आधारित दह्रेंदोर्फ़ कार्यक्रम के अंतर्गत एक अनुसन्धान परियोजना है www.freespeechdebate.com

ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय