06धर्म

हम सभी धर्म का सम्मान करते है भले ही हम उनके विचारों से सहमत न हो

धर्म एवं अभिव्यक्ति की स्तंत्रता

धर्म में सदैव ही स्वतंत्र अभिव्यक्ति की समस्या रही है और धर्म के लिए स्वतंत्र अभिव्यक्ति की। यह सुझाव देना सस्त्य प्रतीत होता है कि कुछ ऐसा सदृश जिसे इस समय हम धर्म कहते हैं वह पहली प्रमुख स्वैच्छिक बाध्यता थी मानव प्राणियों के समूह की अभिव्यक्ति को अपनी शक्ति के अनुसार परिभाषित करके थोपते थे। क्या यहां कोई ऐसी रिकाॅर्ड संस्कृति है, जिसमें कुछ क्षेत्र निषेध या वर्जित न रहे हों।  (संदर्भ डैविड गैलनर)। अटलांटिक के उस पार पश्चिम में, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की चर्चा जिसका विकास 17वी सदी से आज तक होता आया है, जिसके माध्यम से पश्चिम को आत्मज्ञानी कहा जाता है, पूरी तरह से इसके बारे में है कि धार्मिक अधिकरण और मतभिन्नता से कैसा निपटा जाये। 

20सदी के मध्य में, पश्चिम में बडे पैमाने पर यह माना जाता था कि आधुनिकीकरण अपरिहार्य रूप से धर्मनिरपेक्षता को बढ़ावा देता है। किंतु धर्म कभी भी कभी दूर नहीं हुआ। यूरोप में, हमारे काल के कुछ अति घातक विवादों ने विद्युतीय त्रिकोण में इस्लाम, ईसाई और नास्तिकता के मध्य दरार उत्पन्न की हैं। आपने केवल भारत को देखा है और मध्य पूर्व को देखें कि किस तरह से शब्द, छबियां और धर्म से संबंधित प्रतीक चिन्ह नरसंहार के अवसर बन जाते हैं और जिसमें पूरी तरह से अन्य समूहों की परिभाषा शामिल होती है या आंशिक रूप से धर्मः यहूदी, हिंदू, सिख, जैन, अहमदी की।

वे चीजें जिन्हें हमने पवित्र बनाये रखा है, परिभाषा के द्वारा, हमारी अति महत्वपूर्ण चीजों के मध्य में हैं। पोलैंड और रूस में, विधायिका ने इसकी सीमा तय की है कि हम धर्म की ”धार्मिक भावनाओं का उल्लंघन“ की धामिर्क बातों के बारे में क्या कह सकते हैं – सर्वशक्तिमान के मध्य जो धार्मिक भावनाएं हैं जो मानव प्राणियों में होती हैं। मुसलमानों को सिखाया जाता है कि पैगम्बर मुहम्म्द को अपने बच्चों की अपेक्षा अधिक प्रिय बनाये रखें। स्वर्गीय पॉप जॉन पॉल द्वितीय को वर्जिन मैरी की प्रार्थना करते हुए सुनना किसी बच्चे को अपनी मां से बोलते हुए सुनना था। यहां तक कि गैर-आस्थावान भी गहनता से द्रवित हो जाते थे।

इतिहास में अधिकांश समुदायों ने इन भावनाओं का अनुपालन किया है, और अपने सामाजिक और राजनैतिक आदेशों को आश्रय दिया, निषेधाज्ञाओं को थोपकर। आधुनिक राज्यों में, इसे अक्सर ईश्वर की निंदा के रूप में लिया गया है, जिससे कुछ की रक्षा होती है न कि सभी धर्मों की। ब्रिटेन में, एक ईश्वर निंदा कानून जिसने अकेले ईसाई धर्म की रक्षा की केवल 2008 में रद्द कर दिया गया। अधिकांश मुस्लिम बाहुल्य देशों में ईश्वर निंदा कानून हैं केवल या मुख्य रूप से इस्लाम की रक्षा के लिये। पाकिस्तान में, पेैनल कोड की धारा 295 के तहत उद्धरित किया गया है कि पैगम्बर मुहम्म्द के बारे में  ”शब्दा से, या बोलकर या लिखित में, या दर्शनीय प्रतिनिधित्व से, या कोई लांछन लगाकर, संकेत या इशारेबाजी से, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से“ ”अपमानजनक टिप्पणी“ करता है तो उसे मृत्यु दंड की सजा दी जायेगी। वास्तव में, आसिया बीबी को इसी धारा के अंतर्गत मृत्युदंड की सजा सुनाई गई थी। बहुत से मुस्लिम देशों में, ऐसे सुरक्षा कानून हैं जिनको इंटरनेट सेवा प्रदाताओं हेतु निर्धारित नियम व शर्तों में शामिल किया  गया है।  

”धर्म की निंदा“ ?

हर कोई हर किसी का पड़ोसी होता है, चाहे शारीरिक रूप से हो या असल में, यहां पर दो मार्ग होते हैं जिन पर हम चल सकते हैं। हम उन चयनित वर्जनाओं को त्याग सकते हैं, जो किसी क्षेत्र विशेष में केवल एक या कुछ पूर्वाग्रही धर्मों की सुरक्षा करते हैं, या हम उनको सभी धर्मों में समान रूप से प्रसार कर सकते हैं, इस धारा पर कि, ”आप मेरी वर्जना का सम्मान करें और मैं आपकी का सम्मान करूंगा।“ ब्रिटेन में, उदाहरण के लिये, मुस्लिम समुदाय के प्रमुखों ने यह बहस की कि ईश्वर सुरक्षा कानूनू में इस्लाम को शामिल किया जाना चाहिए। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर, इस्लामिक सम्मेलन संगठन, जो 56 मुस्लिम बाहुल्य देशों की एक एसोसियेशन है, उसने संयुक्त राष्ट्र पर यह स्वीकार करने हेतु दवाव डालने में सालों का समय ब्यतीत किया जिसे ”नये बाध्यकारी निर्देशात्मक मानक“ कहा जाता है ”धर्म की निंदा“ पर प्रतिबंध लगाने के लिये। [link to video with Callamard, Benesch, Ghanea-Hancock]

किंतु ”धर्म“ का क्या अर्थ है? तीन तथाकथित इब्राहीम पंथों, इस्लाम, ईसाई धर्म और यहूदी धर्म को छोड़कर, अधिकांश  लोग तत्परता से ऐसे स्थापित धर्मों को अंगीकार करते हैं जैसे हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म, दाओवाद, सिख धर्म, जैन धर्म और योरूबा। कन्फयूसिस भी पुरावस्तु के गुण और बहुत से समर्थकों को अंगीकार करता है, कुछ प्रश्नों के साथ कि क्या यह एक कठोर धर्म है। वैज्ञानिकता के बारे में क्या कहना है? ज्योतिष के बारे में क्या है? धर्मनिरपेक्ष यूरोपवासी अक्सर अमेरिकन की नकारात्मक धार्मिकता का उपहास करते हैं, किंतु एक सर्वेक्षण के अनुसार, फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन की आधी से अधिक जनसंख्या का कहना है कि वे ज्योतिष को गंभीरता से लेते हैं। और 2001 की ब्रिटेन की जनगणना में उन 390,000 लोगों के बारे में क्या कहे जिन्होंने अपनी आस्था को ”जेडी“ के रूप में पहचान दी। 

कौन निर्णय करे कि ”गंभीर“ धर्म क्या है? संयुक्त राज्य में, कानून वैज्ञानिकता को किसी अन्य धर्म की तरह माना जाता है; जर्मनी में, वैज्ञानिकता को धर्म से अलग एक खतरनाक पंथ माना जाता है। (वास्तव में एक जर्मन वैज्ञानिक को धार्मिक सुरक्षा के आधार पर संयुक्त राज्य में शरण दी गई थी।) क्या लंबे समय से चली आ रही मान्यता है और बहुत से समर्थक हैं? ऐसे मामले में, ईसाई धर्म निश्चित रूप से पहली सदी सीई में उत्तीर्ण नहीं हुआ या साधारण रूप से आपको गंभीरता से लोगों से मनमाने की शक्ति है।

अर्हता स्पष्ट रूप से आम तौर पर तर्कसंगत सहमति का मानक नहीं हो सकती। आस्था वह होती है, जो परिभाषा के द्वारा हो, न कि तर्क का सहारा लेकर। कई धर्मों के धर्मशास्त्री यह तर्क देते हैं कि तर्क आस्था को सहयोग दे सकता है उसका साथ दे सकता है, किंतु यह एक जटिल मामला है। इसके अतिरिक्त, कुछ स्थापित धर्मों के केन्द्रीय दावे सीधे एक दूसरे का विरोध करते हैं।

और नास्तिकों के बारे में क्या कहें? क्या उनके दावों में समान सुरक्षा का अधिकार निहित नहीं होता? वास्तव में वे ऐसा करते हैं, जैसे ब्रिटेन का जनादेश अधिनियम, जो ”धर्म समूह“ की परिभाषा ”एक ऐसे लोगों का समूह जो धार्मिक आस्था के संदर्भ में परिभाषा देेता है। या धार्मिक आस्था के अभाव में“। अधार्मिक होना मुझे धार्मिक बना देता है। इतिहासकार भी यह इंगित करते हैं कि कई धर्मों से जुडने से न केवल आस्था स्थापित होती है बल्कि रीतियों को जानने से। आप एक यहूदी हो सकते हैं, धार्मिंक अर्थ में, ईश्वर में आस्था के बिना।  

यहां पर तुच्छ आशंकाएं नहीं हैं, या ”विसंगति कम करने“ का प्रयास। अतः विशाल और तरल की वे सीमाएं हैं जिन्हें धर्म में रूप में निर्मित किया जा सकता है, अतः मानव जीवन के लिए वे प्रश्न अति महत्वपूर्ण है जो उससे उत्पन्न होते हैं, कि ऐसी बाध्यताओं को थोपने के किसी प्रयास का अंत हो जायेगा हमें किस जानकारी से फुसलाया जाता है, हम जिसे खुल कर कहते हैं उसमें क्या अंतर है और जिस जन नीति पर हम स्वयं रूप से खुल कर चर्चा कर सकते हैं, विविध मीडिया से। 

संयुक्त राज्य मानवाधिकार इस पर सहमत है, नागरिक और राजनैतिक अधिकारों को अंतर्राष्ट्रीय अनुबंध के अधिनियम 19 के भाषांतरण में अधिकारिक तौर पर कहा गया है कि, ”धर्म के प्रति सम्मान की कमी दर्शाने पर प्रतिबंध या अन्य आस्था प्रणाली में, जिसमें ईश्वर सुरक्षा कानून शामिल है, अनुबंध के परस्पर विरोधी है।“ प्रदर्शन दिखाना आवश्यक नहीं है, हालांकि, अधिनियम 20 का उल्लंध निषेध है,” राष्ट्रीय, नस्लीय या धार्मिक घृणा की कोई भी वकालत जो भेदभाव, निंदा या हिंसा को उत्साहित करती है।“ इसमें फिर भी भाषांतरण को काफी स्थान दिया गया है, किंतु  किसी धर्म का अपमान (या ”निंदा करना“) इसका मानक नहीं है।

सम्मान के प्रकार

अभी भी, इन जानकारियों से हताशा हुई है, यह कहना कि किसी कानून का प्रतिबंध नहीं लगाया जाना केवल एक अधूरी कहानी है। इसका अर्थ यह नहीं है कि हमारे पास  वास्तव में हमें उसे कहने का विकल्प नहीं है जो हमें पसंद है, जैसे रक्षात्मक रूप से हमें जो पसंद है, जो किसी बारे में दूसरी महिलाओं और पुरुषों के लिये लिये अति महत्वपूर्ण हैं। पी7 में दार्शनिक स्टीफन डारवैल द्वारा दोनों सम्मानों के मध्य श्रेष्ठ उपयोगिता को चित्रित किया गया है। जब हम कहते हैं, असमकक्ष रूप से और बिना किसी शर्त के, ”हम आस्थावानों का सम्मान करते हैं“, हमारा मतलब है कि डारवैल इसे ”पहचान युक्त सम्मान“ कहते हैं। जब हम कहते हैं, ”किंतु आवश्यक नहीं कि आस्था की विषय-वस्तु“ हमारा अर्थ होता है जो डारवैल ने कहा वह है ”अगणनीय सम्मान“। 

अतः इस प्रारूप से मूलअंग का अर्थ हैः मैं इसे जानता हूं, यहां तक कि यदि आप किसी में आस्था रखते हैं जिसे मैं खतरनाक असंवेदना के रूप में लेता हूं, और आपको आस्था न करने हेतु फुसलाने की कामना करता हूं, आपके पास वही मौलिक मानवता है, वहीं वंशानुगत आत्म सममान, वही अहस्तांतरणीय, सार्वभौमिक अधिकार जो मेरे पास हेंै। आपके मानवीय और नागरिक अधिकार, कानून के समक्ष आपकी समानता, वह सम्मान आप जिससे सरलता से मानव जाति के सदस्य बन जाते हैं; कुछ भी कम नहीं होगा या इस बाबत प्राप्त पदवी भी।

यह स्पष्ट रूप से धार्मिक स्वतंत्रता के प्रमुख तत्व को अंगीकार करता है, जेैसा कि अनुबंध के अधिनियम 18 में धर्म को स्वीकार करने या अपनाने, या अपनी पसंदीदा आस्था को अपनाने की स्वतंत्रता को परिभाषित किया गया है, और इसमें कहा गया है ”आराधना में, जानकारी लेने में, अभ्यास और शिक्षाओं में“ या तो व्यक्तिगत रूप से या अन्य के साथ समुदाय में, सार्वजनिक रूप से या निजी तौर पर।

आस्थावान के लिये इस सुस्पष्ट सम्मान में अधिकांश रूप से अनुभवजन्य पहचान (यद्यपि आवश्यक नहीं है) शामिल हो सकती है, यदि पूरी तरह न हो, मानव प्राणी धारण की गई कुछ आस्थाएं वैज्ञानिक परीक्षण में संदेहात्मक नहीं होती। संज्ञानात्मक और धर्मविज्ञान के अध्ययन सुझाव देते हैं कि कोई धार्मिक अवयव ”कठोर तार युक्त“ हो सकता है मानव के मस्तिष्क में। मैंने सुना है कि वैज्ञानिक नास्तिक रिचर्ड डाॅकिन्स ने माना है कि धार्मिक आस्था अतीत में, क्रांतिकारी रूप से लाभकारी रही है। 

इसके अतिरिक्त, हर मानव का अनुभव सुझाव देता है कि वह तथ्य जिसमें लोग आस्था रखते है, अपने अस्तित्व के कोने में वे चीजें जो अन्य को पूरी तरह से असत्य प्रतीत होती हैं, उनको कम विश्वासपात्र नहीं बनाती एक लेखाकार, कार मैकेनिक के रूप में या यहां पर कि (अजीब किंतु सत्य) पत्नी के रूप में या पति के रूप में। स्पष्ट रूप से,  हमें उनकी आस्था प्रणााली बहुत ही गैरअनुपाती और गलत प्रतीत होती है, और जीवन के जितने अधिक क्षेत्र में इसे जितना अधिक अपनाया जाता है, इससे उतनी ज्यादा समस्या होती है। आपको कोई अपने दंत चिकित्सक को अधिक रचनात्मक देखकर काफी प्रसन्नता हो सकती है किंतु उससे अपने बेटे को जीव विज्ञान पढवाना नहीं चाहते। उच्च ज्वर होना (एक आस्थावान जो 2  2 5 है) जो किसी कंपनी में एक लेखाकार के रूप में कार्य करता है, कुछ कठिनाईयां पैदा कर सकता है। किंतु वहां पर जीवन के बहुत से फैलाव हैं जहां, आभ्यास में, ऐसी समस्याएं पैदा नहीं होतीं। हम आस्थावानों को सम्मान कर सकते हैं जबकि आस्था का सम्मान नहीं करते। 

समीक्षा योग्य सम्मान

समीक्षा योग्य सम्मान की मांग बहुत ज्यादा है। इसके लिये इस प्रकार कहा जाता है, ”मैं आपकी कुशलता का अधिक सम्मान करता हूं एक फुटबाल खिलाड़ी के रूप में, लेखक के रूप में आपके कार्य का, एक सिपाही के रूप में आपके साहस का, एक नर्स के रूप में आपके समर्पण का।“ अतः इस सिद्धांत के दूसरे भाग को हम दावों की समीक्षा कहते हैं, टैक रिकॉर्ड और धर्म का वर्तमान अभ्यास। ऐसी समीक्षा का पूरी तरह सामने रद्दीकरण हो सकता है। जैसा कि एक नास्तिक लेखक ने इस पर जोर दिया है, ”मैं आपको बहुत अधिक सम्मान करता हूं आपकी मूर्खतापूर्ण आस्था के सम्मान के लिए। दूसरी अति यह है कि मैं इसे बदलता हूं। कुछ भी हो, हमें एक खुला, बिना बाधा की चर्चा हेतु स्वतंत्र होना चाहिये किसी के दावों के बारे में और सभी धर्मों के बारे में और दूसरी आस्था के बदलाव को शामिल करना चाहिये – या नास्तिक के लिये – बदलाव के भय के बिना। अधिकांश विश्व में, ऐसा मामला नहीं है। आपको प्रश्न करने और उन्मुक्तता हेतु अंदर लाया गया, या जो आपके समुदाय को बहकाते हैं, सामाजिक आलोचना से लेकर मृत्यु तक की अनुशंसाएं पूरी करते हैं।

समीक्षा के रूप सामने कम होते हैं, जो सम्मान के अधिक योग्य रूप में उपजते है। उनमें से एक का वर्णन जर्मनी के दार्शनिक जरगेन होबेरमास द्वारा किया गया है।  ”जो साझा नागरिकता के लिये संघटित साझा पहचान है“ इसे प्रतिबिंबित करते हुये हाबरमास का कहना है, ”धर्मनिरपेक्ष नागरिकों से फोरसन से अलग की आशा नहीं की जाती है जिसकी वे खोज कर सकें, यहां तक कि धार्मिक धार्मिक अभिव्यक्ति में, शब्दार्थ विज्ञान की विषय-वस्तु में और वनावटी व्यक्तिगत संस्थानों में जिसका अनुवाद किया जा सकता है और इसे एक धर्मनिरपेक्ष संवाद में परिचय दिया जा सकता है।“ यदि मैं उसका अनुवाद करूं जिसे आप अपने धार्मिक शब्दकोश में अपनी स्वयं की भाषा में कहते है।, मैं पाता हूं कि आप कुछ ऐसा कह रहे हैं जिससे मैं सहमत नहीं हूं – कम से कम, इसमें सत्य का एक तत्व मौजूद है। यह पूरी तरह से कोई नया विचार नहीं हैः आप इस विचार के कीटाणु तीसरी सदी बीसीई के भारतीय राजा, अशोक के 12वें आज्ञापत्र में मिल सकते हैं, जिसमें उसने लोगों अन्य धर्मों की ”आवश्यक चीजों“ को सीखने की अनुशंसा की थी।

उचित गणनीय सम्मान का एक रूप और भी है, जिसकी खोज आस्था के विषय से की जा सकती  है। मैं अपनी आस्थाओं को पा सकता हूं, यहां तक कि जब यह मेरी भाषा में अनुवादित हों, असमान अनुपात में हो, फिर भी आपके व्यक्तिगत व्यवहार और उस पहचान की प्रशंसा होती है, कम से कम अपने स्वयं के एकांडट से – और बेहतर कौन जानता है? आपकी सराहनीय व्यवहार बडे पैमाने पर या पूरती तरह उन आस्थाओं हेतु लक्षित है। आप जो काम करते है। मैं सम्मान करता हूं, अपने स्वयं के मानदंड से, एक अच्छे, बहादुर, आदर्श के रूप में उन आधारों पर जिनका मेरे लिए कोई अर्थ नहीं है। मान लीजिये यह मामला ऐसा होता, मान लें, 99 प्रतिशत छोटे किंतु उच्च ज्वरों के गिने चुने चर्च (आस्थावान 2  2 5) असाधारण कार्य करते, कमजोर और अपने समुदायों में कष्ट झेल रहे लोगों के लिये निःस्वार्थ सेवा कार्य करते, सदैव इस पर सहमत होते कि यह उनकी आस्था का आदेश था। क्या उनके व्यवहार के लिये उचित समीक्षा समम्मान का वर्णन करने पर द्रवित नहीं होंगे, यहां तक कि जब लगातार इस पर सहमत है कि क्या उनकी आस्था का केन्द्रीय बिंदु असत्य था?

यदि हमारे पास इस प्रकार के समीक्षा सम्मान में से कुछ भी न हो, या तो आस्था के लिये या इस पर आधारित व्यवहार के लिये, हम फिर भी बिना शर्त के, इस सम्मान की पहचान पा लेते हैं आस्थावानों के लिये। इस विभेद को सही करना की एकमात्र उपाय है सभी आस्था के लोगों के लिये और कोई एक साथ मिलकर स्वतंत्रता से रह सकता है।

क्या यह किसी एक आस्था का विशेषाधिकार है?

यह सिद्धांत प्रारूप सभी आस्थावानों से ऐसा ही सबाल करता है जिससे बहुतों को कठिनाई होती हैः स्वयं और आस्था के मध्य के अंतर को बनाने या बनाये रखने के लिये। और यह इस अंतिम उद्देश्य को आमंत्रित करता हैः क्या आप वास्तव में हमें सभी अन्य से ऊपर एक ही आस्था को थोपने की मांग नहीं कर रहे हैं? आस्था वह होती है जिसे हर कोई इस तरह एक साथ रगडता है। क्षमा के उदार गुण में यह आस्था एक जानी मानी मांग करती है कि हमें लगातार विश्वास करने हेतु अन्य को स्वीकार करना चाहिए और दृढ़विश्वास से कार्य करें जिसे हम सोचते हैं कि हम बुद्धि और नैतिकता दोनों से ही गलत हैं। 

उसे स्वीकार करना कैसे सही हो सकता है जो गलत है? उत्तरः क्योंकि यहां पर एक अधिक अच्छा है, वह है कि हर को उसे चयन करने की स्वतंत्रता हो कि अपना जीवन कैसे जीयें, कब तक यह दूसरो को ऐसा करने से नहीं बचाता है। इतिहास सुझाव देता है कि हम एक दूसरे की हत्या करना और प्रताडित करना बंद कर दें यदि हम उन पर अपना ”एक सच्च मार्ग“ थोपने की कामना करते है। अतः, निकट परीक्षण में, यह केवल दूसरे का ”एक सच्च मार्ग“ नहीं है। यह केवल सत्य का मार्ग है जिसका उद्देश्य है इसे  अन्य सच्चे मार्गों के बाहर मानव प्राणियों को जीवने हेतु संभव बनाता है। 

अतः यह सातवां सिद्धांत प्रारूप किसी पर वह आस्था (एक धर्म की) नहीं थोपता। किंतु यह इससे परे प्रश्न नहीं करता। यदि आप इस पर प्रश्न करना चाहते हैं, या सीधे तौर पर असहमत है, यहां आरंभ करें। प्लेटफार्म आपका है।


Comments (6)

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  1. What about violence against animals?Is it a less important?

  2. What does this have to do with free speech?

    • Threats and acts of violence, and intimidation are often used to curtail free speech.

  3. Violence is justified in defense of life in response to violent provocation. While I believe in the Christian principle of pacifism in the way I lead my life, I cannot say that violence to defend life and self and community is aways evil. In 1939 war was the right course of action by the British and French governments against Nazi aggression. But war should never be the first course of action. We need global peace, but we should never ignore aggression for its sake.

    • Sure, World War II would be a great example of how violence can be used in order to prevent life, but unfortunately not all the conflict situations are as black and white. Take for the nations in Africa. The borders of the countries were drawn arbitrarily which left some ethnic groups separated by border and other mixed. Some found themselves on the wrong side of the border. Eventually that led to massive ethnic clashes leaving millions up to this day dead. Violence in Africa happens daily and it needs to be stopped, but who is wrong and who is right? Sure we can keep blaming 20th century European Imperial nations for their ignorance but that wouldn’t help much. So the question is who do we help? Who deserved to get the support of the West and who deserves to be hated? Unfortunately nowadays not least effort is put into trying to determine that and the only factor which makes the biggest difference national interest

  4. très intéressant et utile dans ce monde de violence. c est un bon message a passe

  5. Your comment is awaiting moderation.

    Soy un ciudadano colombiano, siempre afortunado y por mi corta edad (19 años) nunca he tenido encuentros directos con violencia de carteles de drogas o cualquier grupo subversivo. Sin embargo, durante toda mi vida he visto como mi país ha sido afectado por la violencia y los grupos contra la ley. La violencia no puede ser tolerada en ningún sentido! Acaba familias, vidas, países enteros.

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'वाक्-स्वतंत्रता पर चर्चा' ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के सेंट एंटनी कॉलेज में स्वतंत्रता के अध्ययन पर आधारित दह्रेंदोर्फ़ कार्यक्रम के अंतर्गत एक अनुसन्धान परियोजना है www.freespeechdebate.com

ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय