04पत्रकारिता

राजनीतिक क्षेत्र में प्रभावी भागीदारी और सूचित निर्णय लेने के लिए विविध, भरोसेमंद तथा स्वतंत्र मीङिया आवश्यक है

वाक्-स्वतंत्रता और अच्छी सरकार

चौथी शताब्दी ई.पू. चीनी परिचर्चा में ड्यूक जहो ने ज्होऊ के राजा ली से कहा था कि  “लोगों का मुंह ज़बरदस्ती बंद करना एक नदी को रोकने से भी ज्यादा खराब है”. “उसे सच बताओ, चाहे वो नाराज़ ही क्यूँ न हो”,  कन्फ्यूशियस [14:22] उद्धरण संग्रह में कहते हैं. मध्ययुगीन रूसी गणराज्य के स्वराज्य गणतंत्र नोवगोरोड में एक सत्ताधारी परिषद् था जो ‘वेशे’ (जो की “भाषण” के स्लाविक शब्द से उत्पन्न हुआ है) के नाम से जाना जाता था. इसी तरह संसद का अंग्रेजी शब्द “पर्लिअमेंट” फ्रांसीसी शब्द “पर्लैर” (जिसका अर्थ है ‘बोलना’) से उत्पन्न हुआ है. हम इतिहास में कई सभ्यताओं और देशों में इसी विचार को देख सकते हैं- की अच्छी सर्कार में वाक्-स्वतंत्रता की बहुत अहम् भूमिका है.

लेकिन वाक्-स्वतंत्रता को ‘स्वराज’ जैसे क्रन्तिकारी विचार से जोड़ने वाली पहली सभ्यता ग्रीस के छोटे से शहर अथेन्स में करीब २,५०० साल पहले पी गयी. अथेन्स के नागरिको ने इसे ‘डेमोक्रेसी’ (लोकतंत्र) का नाम दिया, जो की ग्रीक शब्द ‘दीमोस’ (याने कि लोग) और ‘क्रैतोस’ (याने कि शासन) से उत्पन्न होता है. सासन की इस अनोखी विधी का पालन करने के लिए वे एक “सभा के स्थान” पर एकत्रित होते थे. फिर एक सूत्रपात पूछता था, “कौन इस सभा को संबोधित करना चाहता है?”. इसके बाद कोई भी स्वतन्त्र पुरुष खड़ा होकर पूरी सभा को अपने मन की बात बता सकता था और किसी भी सार्वजनिक नीति का प्रस्ताव लोगो के सामने रख सकता था. आम तौर पर शहर के ३०,००० स्वतन्त्र पुरुषो में से करीब ८,००० पुरुष इन सभाओ में शामिल होते थे. हाँ, ये सही है की ये हक़ सिर्फ स्वतन्त्र पुरुषों तक सीमित था. महिलाओ और बाध्य पुरुषों को अभी २,००० साल और इंतज़ार करना पड़ा.  इसके बावजूद अथेन्स के नागरिको ने दो बहुत महत्त्वपूर्ण विचारो का मार्ग दर्शन करा- जिन्हें ‘पर्र्हेसिया’ और ‘इसेगोरिया’ का नाम दिया गया. ‘पर्र्हेसिया’ (जिसका ग्रीक मैं अर्थ है ‘सब कुछ कहने की क्षमता’) से उनका मतलब था कि लोगो को अपनी अंतरात्मा के अनुसार सच बोलने के लिए पूरी तरह स्वतन्त्र और निडर होना चाहिए. ‘इसेगोरिया’ का अर्थ था कि सब लोगो को अपनी बात कहने का सामान अधिकार होना चाहिए. ये दो विचार, जो आज कई मुल्को में हर आदमी और औरत के लिए उपलब्ध हैं, वाक्-स्वतंत्रता के मूल सिद्धांतो में गिने जाते हैं.

संचार के माध्यम क्या हैं?

कई स्थानो में आम लोग पड़ोस, गांव, स्कूल और विश्वविद्यालय कि विधानसभाओं में स्वतन्त्र और स्पष्ट रूप से एक-दुसरे से बात कर सकते हैं. लेकिन आज अधिकतर समुदायो और स्वभावतः राज्यो में ऐसा करना नामुमकिन है क्यूंकि बहुत बड़ी संख्या में लोगो का एक साथ बैठना, चर्चा करना और फिर किसी मुद्दे पर निर्णय लेना नामुमकिन है. इसी लिए हमें संचार के माध्यमो, यानी ‘मीडिया’ कि आवश्यकता है.

15 वीं सदी के जर्मनी में जोहन्नेस गुतेंबेर्ग के द्वारा छापेखाने के निर्माण के पांच सदियों बाद भी संचार के माध्यम केवल कागज़ पर छपे शब्दो और तस्वीरो तक सीमित थे: याने कि किताब, अखबार, पर्चे, इत्यादि. १७९१ मैं अमेरिका के संविधान मैं किया गया पहला संशोधन भी गुतेंबेर्ग के इस आविष्कार को विशेष सम्मान देता है. इसमें कहा गया है कि “अमरीका का कांग्रेस कोई ऐसा कानून नहीं बना सकता जो …. वाक्-स्वतंत्रता या छापेखाने की स्वतंत्रता पर कोई रोक लगाये”. आखरी सदी में रेडियो और टीवी और व्यापक दर्शको तक पहुच पाए. इन संचार माध्यमो के लिए लिखना और इनके द्वारा प्रसारण करना जिन लोगो का काम बना, उन लोगो को हम आज ‘संवाददाता’ के नाम से जानते हैं.

आज, इंटरनेट या मोबाइल फ़ोन का उपयोग करने वाला कोई भी व्यक्ति शब्दो, छवियो, विचारो और जानकारी का प्रसार कर सकता हैं. इस तरह हम सब पत्रकार और प्रकाशक बन सकते हैं. हाल के वर्षों में, दोनो चीन और तुर्की में हुए भूकंप की खबरें अक्सर अनाम ‘ब्लोग्गेर्स’ के द्वारा सामाजिक संचार माध्यमो (जैसे फेसबुक  और ट्विट्टर) पर प्रसारित की गयी. जॉर्ज पोल्क पुरस्कार, जो कि पत्रकारो के लिए सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कारो में से एक है, एक ईरानी प्रदर्शनकारी नेदा अघन-सोल्तन की मौत को दर्शाने वाले चालीस सेकंड के अनाम विडिओ को दिया गया था. अज्ञात नागरिक पत्रकारो के लिए यह एक श्रद्धांजलि है.

हम में से कई लोग इन विविध संचार माध्यमो के उत्पादन से बहुत कुछ प्राप्त कर सकते हैं. तीस साल पहले तक, विकसित देशो में अदिकतर लोग अपनी सारी खबरें (और उनपर आधारित राय) एक्लोते समाचार पत्र और मुट्ठी-भर रेडियो और टेलीविजन चैनलो से प्राप्त करते थे. आज कोई भी व्यक्ति, जो इन्टरनेट का बेमियादी रूप से उपयोग कर सकता है, वह माउस का एक बटन दबा कर हजारो सूत्रो, पत्रिकाओ और चंनेलो से जानकारी प्राप्त कर सकता है. ‘लाइवस्टेशन’ (अंग्रेजी और अरबी), ‘कर्रेंट टीवी’ (अंग्रेज़ी), और ‘लाइवजौर्नल’ और ‘टीवीट्यूब’ (विभिन्न भाषाएँ), ऐसे सूत्रों के अछे उदहारण हैं.

आपके संचार माध्यम कितने विविध हैं?

संचार माध्यमो- और उनके द्वारा बोलने वाले लोगो- की बहुलता हमें सकारात्मक तरीके से वाक्-स्वतंत्रता के राजनैतिक उपयोग का एक अभूतपूर्व अवसर देती है. पर इसके संपूर्ण विभव को संपादित करने में अभी बहुत लम्बा रास्ता बाकी है. वास्तव में इस दुनिया के अधिकतर लोग कुछ फेन मीडिया घरानो से ही प्रभावित होते हैं. प्रत्येक देश में आज भी केवल २-३ टीवी चैनल बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं. दोनो निजी और सार्वजनिक शक्तिया हमारे कहे और सुने को आकर देती हैं और सीमांकित करती हैं: चाहे वो सर्कार, दूरसंचार की निजी कंपनियां, ईरान में अयातोल्लाह, इटली में सिल्वियो बर्लुस्कोनी या ब्रिटेन में रूपर्ट मर्डोक हो.

और अभी तो हमने उन हजारो स्थानो की बात शुरू भी नहीं करी है जहां पत्रकारो (नागरिक पत्रकारो सहित) पर प्रतिबन्ध लगाये जाते हैं, उन्हें पीटा जाता है, कैद किया जाता है, और यहाँ तक की गोली भी मारी जाती है- सिर्फ “तथ्यो से सच्चाई की तलाश” (पुरानी चीनी कहावत) करने के लिए, और फिर उस सच को बोलने के लिए.

यहां एक उपयोगी उपकरण है (यूरोपीय शोधकर्ताओं द्वारा निर्माणित), जो आपको यह मापने में मदद करेगा कि आपके देश के संचार माध्यम कितने खुले और विविध हैं. इन शोधकर्ताओं ने सचार माध्यमो कि विविधिता (“मीडिया प्लुरालिस्म”) को मापने के लिए छह अलग-अलग क्षेत्रो का उत्पादन किया है.  उदाहरण के लिए, यह देखा जाता है कि क्या मीडिया के स्वामित्व और नियंत्रण में विविधता है? या एक देश के टेलीविजन, प्रेस, इंटरनेट का बहुत अधिक हिस्सा या तो सर्कार द्वारा या कुछ व्यक्ति मीडियादिग्गज और निगमो द्वारा प्रभुत्व है? उदाहरण के लिए, मेक्सिको में, राष्ट्रीय टेलीविजन बाजार पर सिर्फ दो कंपनियो, ‘तेलेविसा’ और ‘अज्तेचा’ ने कब्ज़ा  किया हुआ है. क्या आपके देश में सभी मुख्य जातीय, धार्मिक और भाषायी समूहो को पर्याप्त रूप से मीडिया में प्रतिनिधित्व दिया जा रहा है? (लगभग हर जगह उत्तर है: नहीं). और अगर हम इसके बारे में सोचें, तो सिर्फ आपके देश में ही क्यूँ? हमारे परस्पर ग्रह के बाकी हिस्सो से आने वाले समाचार और विचारो के बारे में क्या?

फिर, महत्वपूर्ण हैं राजनीतिक बहुलवाद. क्या एक पार्टी, या कोई एक प्रवृत्ति, या हित समूह मीडिया पे ज्यादा हावी है? क्या हर कोई टीवी स्टेशन या अखबार एक या दूसरी दिशा में पक्षपाती है? क्या इससे कोई विरोध है जब तक हर मुख्य राजनीतिक प्रवृत्तिया अपने टीवी और रेडियो चैनलों, अखबारों और वेबसाइटों से दूर दूर तक पहुँच सकते हैं ?अमेरिका में रूपर्ट मर्डोक के फॉक्स न्यूज चैनल का आदर्श है- “निष्पक्ष और संतुलित” खबरें,  लेकिन व्यवहार में फॉक्स और बहुत कुछ है. तो क्या ये ठीक है? बशर्ते कि अन्य चैनल एक विपरीत दृष्टिकोण देते हुए, समान रूप से ख़बरों को अनुचित और असंतुलित करे? [मीडिया अग्रणी विद्वान पाओलो Mancini का यह तर्क है]

या आप को लगता हैं की हमें “निष्पक्षता” के आकांशा करने चाहिए ? इसका मतलब वैज्ञानिक निष्पक्षता नहीं, जो मानवीय मामलों में असंभव है बल्कि एक गंभीर प्रयास की (क) तथ्य को टिप्पणी से अलग रखें, समाचार रिपोर्टिंग को अपने नीजी विचारों से, और(ख) सभी माध्यमों में, चाहे- टीवी, अखबार या वेबसाइट –  व्यापक समाज में पाय हर मुद्दे के मुख्य परस्पर विरोधी विचारों का उचित प्रतिनिधित्व हो.

नियंत्रण और आत्म – नियंत्रण

यहां तक ​​कि उदार लोकतंत्र देश भी बहुत अलग तरीके से इन चीजों को संभालते है. ऐसे देशो में किस का नियंत्रण सरकार, अदालत, सार्वजनिक अधिकारी द्वारा किया जाय और किसको बाज़ार या समाज के लिए छोड़ दिया जाय इसमें बहुत अंतर है.  उदाहरण के लिए, ब्रिटेन मे अब तक प्रेस अपना स्वयं नियंत्रण करती है, लेकिन रेडियो और टीवी का सार्वजनिक प्राधिकारी ‘ओफ्कोम’ द्वारा नियंत्रण अनिवार्य है. जो इंसान ब्रिटिश प्रसारण की  संपादकीय सामग्री का कई सालों से जांच कर रहा है, उसका यह कहना है की, ‘जब भी मैं अमेरिका का दौरा करता हूँ, मुझे बताया जाता है कि अगर ओफ्कोम के बराबर, संघीय संचार आयोग (एफसीसी), कभी प्रसारकों पर निष्पक्षता  लागू  करना चाहे तो वह क़ानून की नज़र मे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन करने जैसा होगा. ब्रिटिश कानून में जो निहित वह अमेरिकी कानून में अवैध है. ‘

भारत में, एक दिलचस्प चर्चा है की क्या आत्म – नियंत्रण देश कीलिए पर्याप्त है . देश के प्रेस परिषद का अध्यक्ष का कहना है की देश का मीडिया  “जनविरोधी”. यहां तक कि ‘हिन्दू’ अखबार के संपादक ,एन राम का भी मानना है, “हमें कोई प्रकार के अनुशासनिक प्राधिकारी की जरूरत है. आत्म नियंत्रण अकेले काम नहीं करता. ”

इस मुधे पर विभिन्न देशों की विभिन्न सोच है. समय के अनुसार उनकी नीतियों का भी परिवर्तन होता है. सार्वभौमिक कोई एक “सही” विधि नहीं है. अंत मे परिणाम मायने रखता है: खुला, विविध मीडिया. इसलिए हम, लोगों को लगातार एक खुले, विविध, मीडिया की मांग करनी चाहिए जो विशुधिता, गहराई, और निर्भयता से काम करे.

अब हम सब पत्रकार हैं

इन दिनों हमारी मांग केवल खुले , विविध, और बेहतर मीडिया तक सीमित नहीं है . हम यह खुद कर सकते हैं. तभी हमारे मसोदे सिद्धांत कहते हैं, “हमें आवश्यकता है और हम बनाते है खुले और विविध संचार माध्यम ‘.  आपकी पसंदिद्ता पत्रिका नहीं है? अपनी खुद की शुरू करिए. हाँ यह भी सच है की ऐसी कई बेमतलब की बातें इन्टरनेट पे कही जाती है. ज्यादातर लोग जो ब्लॉग, तवीत, या अन्य इंटरनेट और मोबाइल डिवाइस के द्वारा “बात” करते है वह दुनिए के किस्सी अस्पष्ट कोने से कोई एकान्त आवाज की तरह हैं. यह एक विशाल “लंबी पूँछ” जो बहुत कम लोगो तक पहुँचती है जैसा है. और दूसरे छोर पर, वहाँ अभी भी अपेक्षाकृत कुछ ही है जो अनेको तक पहुँचते हैं.

हाला की ऐसे भी कई उदहारण है जहाँ व्यक्तिगत पहल सफल हुई हैं, जो की इन्टरनेट के इलावा संभव नहीं ह हो पाता. ऐसे कुछ उदहारण है:- दक्षिण कोरिया की अद्भुत ‘ओह माय न्यूज़’, जो लगभग पूरी ही नागरिक पत्रकारों द्वारा लिखी गई है. फेसबुक (अरबी), पे ‘हम सब खालिद सैद है‘ पृष्ट जो वैल घोनिम द्वारा स्थापित किया गया था , मिस्र मे होस्नी मुबारक के विरोध मे और अंतता उसको गिराने मे मददगार रहा है. ‘दृद्गे रिपोर्ट अमेरिका में और चीनी ब्लॉगर हान हान ऐसे कई नमूने है. रूस में अलेक्सई नवल्न्री जैसे ब्लॉगर्स ने ऊंचे स्थानों में भ्रष्टाचार को उजागर किया गया है.

एक अन्य तरीका है जिससे हम खुले और विविध मीडिया  को बेहतर कर सके है. इन्टरनेट पे ऐसे भी अनेक प्रमाण है जो बताते है की इन्टरनेट वास्तविकता की एक झूठी दृष्टि और विकृत संस्करणों को मजबूत कर सकता है. ऑनलाइन थोड़ा असंतुलित व्यक्ति अपने जैसे कई लोगों को ढून्ढ सकता है जो मानते है कि चे ग्वेरा अभी भी जिंदा है या ‘एडाम’ पनीर कैंसर के लिए जिम्मेदार है.वे खुद को केस सुन्स्तें द्वारा कहे गए  एक “जानकारी कोकून”  में बांद लेते है जो की लगातार ऑनलाइन एक दूसरे के झूठे और कभी कभी खतरनाक विश्वदृष्टि को मजबूत कर सकता है.

कुछ लोगों का ऐसा कहना है की इन्टरनेट के सर्च एन्गींस जो समय के अनुसार आपकी खोज को आपके लिए उपयुक्त बनाते है वह ऐसी  प्रवृत्ति को बल दे सकते है. इसका कारण जादातर कंपनियों की दोधारी इच्छा है जो ग्राहकों के लिए एक अधिक व्यक्तिगत सेवा प्रदान करती है और उन्हीं ग्राहकों को  विज्ञापनदाताओं के लिए फुसलाती है. अगर हम सब अपने छोट्टे बुलबुले में रहेंगे तो वहाँ कोई साझा सार्वजनिक क्षेत्र नहीं बन पायेगा. विशेष करके एक भव्य वैश्विक “विधानसभा की जगह” जहाँ  तथ्यों और राय का विनिमय संभव हो हम एक ऐसी जगह पे होंगे जहाँ हम अपने व्यक्तिगत पोर्टेबल कक्ष में बैठ के केवल समान विचारधारा वाले वाष्पकणों में सांस लेंगे.

यह खतरनाक है. लेकिन निराशा का कोई कारण नहीं है. हम ‘मीडिया’ या ‘इन्टरनेट’ जैसी अनूठी शक्ति की कोई निष्क्रिय वस्तु नहीं हैं. हम खुद को और अपने बच्चों को इन्टरनेट साक्षरता में शिक्षित कर सकते है, ताकि हमें इन  प्रभावों के बारे में पता रहे. हम समर्थन कर सकते है ऐसे ऑनलाइन प्रकाशनों का जो जो परस्पर विरोधीविचारों को पेश करती है.  हम तैयार कर सकते है ‘ फक्तचेक.ओर्गजैसे साधन जो तथ्य को मिथ्या से अलग कर सके. (अन्य भाषाओं में उदाहरणों  हैं: Slovakian वेब परियोजना -‘ देमगोग.सक‘. हम विकिपीडियाऔर भी ज़्यादा बेहतर स्त्रोत बनाने की लिए भी काम कर सकते है.

चाहे कुछ भी कहें या करें , गुटेनबर्ग के बाद की दुनिया हमें एक खुले और विविध मीडिया को बनाने की अधिक संभावनाए  देती हैं.


Comments (16)

Google अनुवाद द्वारा स्वचालित मशीन अनुवाद प्रदान किया जाता हैं. यह आपको बताता है की योगदानकर्ता क्या कहना चाहता हैं, लेकिन इसका एक सटीक, सूक्ष्म अनुवाद की तरह भरोसा न करें.

  1. Dick,

    You claim that “it is not … permitted to criticise Muslim immigration and Islam”. You “demand that anyone who wants to say that [Islam is incompatible with Western democracy] be able to do so, and feel no compulsion to be silent”. You “think people should be entitled to say what they believe about Islam”. I don’t understand what you mean.

    Who is stopping you from speaking your mind? Your views are right here, out in the open.

    Views very much like yours are all over the mainstream media. They are also being articulated by influential and widely-read bloggers. Just look here [http://bit.ly/VthfKR], here [http://bit.ly/18ocQxU], here[http://bit.ly/18m1J8u], here[http://bit.ly/10UkffD], here[http://bit.ly/124TpZH], here[http://bit.ly/16dH6f1], or here[http://dailym.ai/132KhBn] – all circulating widely just in the last few days.

    How can you say that people are prevented from reading and writing such things when they and you are saying and writing them every day? Do you feel that what is being published does not go far enough? If that’s the case, look at the comment threads (if you can read German, you will particularly like this [http://bit.ly/NQftA5]), or Twitter, or Reddit, or Youtube. Legions of users post violently anti-Muslim statements there, which get likes and upvotes. Sometimes one or two people are arrested and later released without consequences if they are deemed to incite hatred or violence, for which they have to go much further than you do in your post; the cases your link referred to involved direct threats. Why should those be legal?

    Views similar to yours are also represented by politicians in the UK [http://bit.ly/1aizioB], the Netherlands [http://bit.ly/10HcmLs], Germany [http://bit.ly/16yAkzd], France [http://bit.ly/112jXn0], Austria [http://bit.ly/188rzwM] & Switzerland [http://bit.ly/16oRl07] & Italy [http://on.ft.com/13YvwRh] (where these parties were or are in government), Denmark [http://bit.ly/10zF4kN], the US [http://bit.ly/19lJcrS] and, I believe, your own country, Finland.

    Many political parties cater to the “I’m not racist but…” and “We can’t even say/do what we want anymore” crowds; they have plenty of politicians who warn that “sharia law” will be imposed on their countries if they do not protect western liberal democracy against ‘Islam’, including by deporting fellow citizens they disagree with. And gain, if the likes of Farage and Le Pen do not go far enough for your taste, there are even more radical parties in most of these countries, who in some cases receive state funding and in all cases enjoy the same police protection as everyone else when they want to voice their opinions.

    You seem to think your views are being censored by the police, political correctness and/or a liberal bias in the news media. I just don’t see any evidence that that’s the case. There is absolutely no shortage of anti-Muslim sentiment in our public discourse. On the contrary, people espousing such sentiments have been allowed to inject their poison into the veins of most western body politics, clouding the judgement of policy-makers and an often ill-informed public, so that bearded men and veiled women and conservative Muslims are now widely perceived as ‘Islamists’, ‘radicals’ and/or ‘oppressed women’, and many in the west have been convinced that ‘sharia law’ is the devil incarnate, and ‘jihad’ some global plot hatched in the 7th century to kill all infidels. (Evidence here [http://bit.ly/ZdZQpa] and here [http://bit.ly/ZsVNI6].)

    So why do you say that people like you are being silenced when you clearly have a platform in the media, on the internet, on the street and in politics? It must be because, beyond the crowd in your own echo-chamber, you have no audience. Despite everything, not many people agree with views as extreme as yours, even though more and more agree with a diluted version of your views because of the platform given to anti-Muslim rhetoric in the media and online. 

    What’s more, most people probably dislike you rather instinctively. Starting a post with I’m-not-racist-but doesn’t help; nor does calling 2 billion people “naive”, or 12 million fellow citizens “enemies in our midst”. Maybe a bit of civility would do the trick, Dick? You may think you are being censored, but in reality you are just being ostracised by the majority who disagree with your weak arguments and/or your vicious rhetoric.

    All your claims rest on the assumption that you can extrapolate from the ‘Islam’ of criminals like Michael Adebolajo and Anjem Choudary to the faith(s) of billions of people living all over the world and throughout history. You assume that what hate preachers say and governments do under the banner of religion is the one and only interpretation of a kaleidoscopic and fluent faith and centuries of practice, law and scripture. Yet you only apply this twisted reasoning to Islam.

    If you applied your logic to Christianity, you would have to conclude that ‘Christians’ (i.e. everyone from 21st-century Quakers to 12th-century crusaders and Jesus himself) are and always were like Anders Breivik and Terry Jones; that they are and were and will always be evil because some (democratic!) majority-Christian countries have barbarous criminal justice systems (including the death penalty, extrajudicial assassinations and torture); that Christianity is inherently racist and homophobic and misogynistic because it was and is used by many of its followers to justify slavery and resist movements for equality to this day; and that many Christians want to remove the liberal democracy that is incompatible with their faith, and replace it with Biblical law.

    Those who really care about their faith, in my personal experience, care about all of it, especially the bits that ask them to do what they don’t want to do. Those who abuse religion to justify their crimes always seem to care about nothing but “an eye for an eye” and the randomly picked and decontextualised quotes that give them an excuse for what they want to do for reasons unrelated to religion. So what’s the point of lumping them all together and condemning the many for the actions of the few? Condemning all members of an arbitrarily and loosely defined group for the actions of some of its ‘members’ is either nonsensical or bigotted. But if you are going to engage in such generalisations, you will have to at least hold everyone to the same absurd standard, or people will put labels on you that you do not seem to want to carry. You can’t insist on your right to call something you think is a spade a spade but deny others the right to do the same.

  2. I agree with ‘we speak openly about all kinds of human difference’, but the problem comes with defining ‘with civility’, because that is the point where certain groups will want to take offence at certain inconvenient truths, for instance that Islam is not a religion of peace and brotherly love.

  3. I am against racism, and I have nothing against any religion other than Islam. I think people should be entitled to say what they believe about Islam and the very real actions caused by Islam. Many people have had enough of the politically correct discourse that Islam is a religion of peace, etc etc, but are afraid to say so because they would immediately be labelled Islamophobes. Due to our tolerance, the non-Muslim inhabitants of Western countries are allowing ourselves to be steamrollered by Muslims and their increasingly intrusive demands – sharia law, changes in our foreign policy, etc. It seems to me that they are enemies in our midst and not loyal citizens. Islam is simply incompatible with Western democracy, and I demand that anyone who wants to say that be able to do so, and feel no compulsion to be silent about this most pressing of issues.

  4. Some discussions about human difference cannot be civilly discussed; for example, racism should never be allowed.

  5. My opinion is that such kind of speech and expression of thoughts, jokes, etc. connected with immutable characteristics of people, shouldn’t be limited by law and society: it should be up to every person, what should he/she say and what shouldn’t. Up to his/her mind and conscience. Until it harms person.

  6. Freie Meinungsäußerung ist wichtig, solange der Redner dabei nicht die Recht e anderer Menschen beschneidet oder andere Lebewesen diskriminiert.

  7. A very interesting and controversial article posted by Janet Haney – Kenen Malik on multiculturalism. He suggests that we can either pledge equality of cultures or equality of people, but not both. Thanks Janet 🙂 !
    http://www.kenanmalik.com/lectures/multiculturalism_if.html

    • *Kenan thus represents the Enlightened universalist extreme. Maybe we can use this as an angle here for future comments.

  8. I disagree with most of the statements made in this article for one reason. All of the arguments made above are valid and work only if one assumes that a human is a rational and educated creature who will inform him or herself before making a decision or forming an opinion. That however is not true, and sadly enough many of us all fall under pressure by our envirnment and propaganda. These so called insults which one directs towards others under the excuse of freedom of speech are messages of hate. They in themselves want to hurt others and limit the freedom, human rights and the freedom of expression of a particular group. Therefore limiting the “freedom” in the “freedom of speech” is ironically an important part of achieving a more tolerant and civil society.
    Moreover, I completely disagree with the comment made about the Indian Penal Code. The history of the law is completely irrelevant. True, it might have been originally written for a different purpose but it doesn’t mean that it always has to be used just for that same purpose. If freedom of expression was once used as an excuse to limit the rights of colonized citizens, it does not mean that it now should be abolished because of its dirty history. In fact, as the author has stated it himself, there is huge room for interpretation in the issue of free speech, therefore this same law can be used in more noble ways.

  9. As a general principle I definitely agree that free speech should be a universal right. Contentwise, however, there should be restrictions.
    Considering the fact that communication occurs between two subjects, the sender and the recipient, both subject’s values matter in the process. The tricky part in the proposed principle therefore is ‘civility’.
    Civility itself restricts free speech. I think most people agree that the publication of the Muhammad cartoons were not an act of particular civility, because it offended the religious / moral values of the recipient group.
    How can we thus find the balance between the universal right to free speech and non-universal values of sender / recipients?

    • Hello Annemarie. I saw the Danish Cartoons for the first time this week. They were not shown in UK when the furore first broke out, and I didn’t think about them much again until recently (it was the DV8 dance event – Can We Talk About This? – that brought them back to mind, something I saw in London a few weeks ago). I would be disappointed if ‘most people’ agree that their publication was ‘not an act of particular civility’. But I would not be surprised that people had been frightened into saying such a thing after the alarming response of the murderous threats at the time. Remember – the cartoonist was threatened with a violent death: http://www.guardian.co.uk/world/2010/jan/04/danish-cartoonist-axe-attack

      • Hi Janet, apologies for my late response. I hadn’t seen on my account that you commented on my post.
        I just had an argument with a girl studying Human Rights at LSE. In summary, she clearly argued that if she was a cartoonist, she would never (!) publish something which would so obviously assault a certain group. Would you do so? Why do you think that this case was not ‘not an act of particular civility’?

  10. Excellent piece! I agree with almost all of the points made here.

    My only worry associated with this proposed “civil” and courteous free speech is the remarkable ability of the same spoken language to be simultaneously civil and uncivil to different audiences. Accounting for a gradient of such differences in perception, I wonder if the final test of civility in tricky situations will indeed be the lack of violence/ violent overtures. And if that is the case, it may as well be codified as such in law!

अपनी भाषा में टिप्पणी दीजिये

क्या आप इस सिद्धांत से सहमत हैं?

हाँ नहीं


'वाक्-स्वतंत्रता पर चर्चा' ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के सेंट एंटनी कॉलेज में स्वतंत्रता के अध्ययन पर आधारित दह्रेंदोर्फ़ कार्यक्रम के अंतर्गत एक अनुसन्धान परियोजना है www.freespeechdebate.com

ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय