03ज्ञान

हम ज्ञान के विस्तार के लिए प्रतिबद्ध है और किसी भी प्रकार की बंदिश के खिलाफ

दुनिया अब भी प्रतिबंधों से भरी पड़ी है

यह कहना है कि चर्चा और ज्ञान के प्रसार में कोई प्रतिबंध नहीं होना चाहिए, स्पष्ट लग सकता है। फिर भी सार्वजनिक और निजी शक्तियों दोनों ने बार-बार ऐसे प्रतिबंध थोपने की कोशिश की है, और अब भी कर रहे है। सबूत के खिलाफ परिकल्पना परीक्षण द्वारा सत्य के उन वैज्ञानिक स्थापनाओं से पहले धार्मिक आस्था से पता चला है कि एक बड़ी जाति के साथ सत्य का दावा सबसे ज्यादा टिकाऊ प्रतिबंध से मिलकर बनता है। शायद इतिहास में सबसे प्रसिद्ध ऐसा मामला यह है कि रोमन कैथोलिक चर्च का इतालवी वैज्ञानिक गैलीलियो गैलीली पर उसका दावा वापस लेने को मजबूर करना था कि पृथ्वी अपनी कक्षा में सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करती है।

हमारे अपने समय में, एक ब्रिटिश इमाम ओसामा हसन, अपने ही मस्जिद में इस विकास के सिद्धांत के साथ इस्लाम अनुकूल है, कि इसके विषय में बहस करने के लिए मौत की धमकी मिली थी। आपको भीड़ भरी मस्जिद में विकास कहकर चिल्लाते हुए अपने आलोचकों की चुटकी नहीं लेनी चाहिए थी। (यह अमेरिकी विधिवेत्ता ओलिवर वेंडेल होम्स द्वारा प्रसिद्ध टिप्पणी पर एक नाटक था कि आपको एक भीड़ भरे थिएटर में आग! कहकर चिल्लाने की आजादी नहीं है।) अधिकांश मुस्लिम दुनिया में अब भी विकास नहीं पढ़ाया जाता है। यह प्रतिबंधित है। [P7] [vjchnk – इस पर सीएस करना चाहते हैं,

कंपनियों, समितियों और व्यावसायिक संगठनों ने भी जांच की उन लाइनों को अवरोधित किया है, अगर उसे वे धमकाने वाला पाते हैं। औषधीय कंपनियों की दवाओं के वैज्ञानिक परीक्षणों से प्राप्त प्रतिकूल सबूत को भी दबा दिया अथवा नजरअंदाज कर दिया गया जिसमें उन्होंने भारी निवेश किया था। ष्सबूत बिंदुमात्र नहीं है पर इस पर आधारित है कि यह “फर्जी उपचार” को बढ़ावा देता है, कहने के लिए ब्रिटिश विज्ञान लेखक साइमन सिंह पर ब्रिटिश काइरिप्रैक्टिक संघ द्वारा मुकदमा किया गया था। परिवाद कानून [¬P9] ] का उपयोग मजबूत वैज्ञानिक बहस को रोकने के लिए किया जाता है। निजी शक्ति प्रतिबंध के अन्य प्रकार … ऑनलाइन? उदाहरण के तौर पर अन्य, गैर-पश्चिमी … कृपया, सुझाव दें,

कई राज्य भी प्रतिबंधित क्षेत्रों को आरोपित करते हैं। कभी-कभी ये अपने नागरिकों [¬P8,  या सरकारी राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे आधार पर न्यायोचित आधिकारिक रहस्यों की गोपनीयता की रक्षा के साथ ऐसा करना होता है [¬P10,। यहाँ, एक व्यक्ति कुछ प्रतिबंध के लिए सिद्धांत रूप में तर्क को स्वीकार कर सकता है। समस्या सीमाओं को अंकित करने में है।  अक्सर, तथापि, यह प्रतिबंध अतीत से सार्वजनिक घटनाओं और हस्तियों की ज्ञान की चिंता करता है। यहाँ ऐसा कोई औचित्य नहीं है।

अतीत पर नियन्त्रण रखना

सबसे कुख्यात उदाहरण में इतिहास से वैचारिक और राष्ट्रीय शर्मनाक वृत्तांतों को व्यवस्थित रूप से नकारना या त्रुटिपूर्ण प्रतिनिधित्व करना शामिल हैं। दशकों से, सोवियत संघ और नाजी जर्मनी के बीच पोलैंड के विभाजन के लिए प्रदान करते हुए, सोवियत संघ ने नाजी-सोवियत अनाक्रमण संधि  1939 के गुप्त मसविदा के अस्तित्व से इनकार किया है (मुझे ताजा तौर पर याद है कि एक अग्रणी सोवियत इतिहासकार ने मेरे सामने इसको नकारा था)। दशकों से, यह भी दावा किया है कि 1940 में सोवियत संघ के सुरक्षा बलों द्वारा पोलिश अधिकारियों की हत्या करना वास्तव में 1941 में नाजियों द्वारा हत्या करना था। अन्य सुझाव देने के कारण लोग को कैद कर लिया गया; दूसरे शब्दों में सच बोलने के लिए।

आज के चीन में आप शायद 1989 में त्यानआनमेन चैक पर क्या हुआ था, पर स्वतंत्र रूप से चर्चा या ज्ञान का प्रसार नहीं कर सकते हैं। यदि आप चीन में बाइडू खोज इंजन पर “नआनमेन नरसंहार” के लिए खोज करते हैं, तो आपको यह संदेश मिलता है: “खोज परिणाम का प्रासंगिक कानूनों, विनियमों या नीतियों के साथ अनुपालन नहीं हो सकता है, और प्रदर्शित नहीं कर रहे।ष् ईरान के इस्लामी गणराज्य में, आप राज्य के संस्थापक अयातुल्ला खुमैनी की आलोचनात्मक जीवनी प्रकाशित नहीं कर सकते हैं।

इस तरह के उपाय सर्वसत्तात्मक और सत्तावादी सरकारों तक ही सीमित नहीं हैं। तुर्की में, पत्रकारों पर देश के संस्थापक, केमाल अतातुर्क के बारे में आलोचनात्मक दावा करने के लिए मुकदमा चलाया गया था। गांधी की एक गंभीर जीवनी को भारतीय राज्य गुजरात में प्रतिबंधित कर दिया गया था, क्योंकि इसमें कथित तौर पर सुझाव दिया गया है कि वे शायद उभयलिंगी थे। (दावे का लेखक ने इनकार किया)।

होलोकोउस्ट का खण्डन

ऐतिहासिक बहस पर यूरोप के सबसे उदार, कानून को मानने वाले लोकतंत्रों में से कुछ में  प्रतिबंध कानून मौजूद है। यहाँ पर द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नाजियों यूरोपीय यहूदियों के लाखों लोगों की हत्या की गई थी, मानने से इनकार करने पर जेल भेजा जा सकता है, अब आम तौर पर यह नरसंहार होलोकोउस्ट के नाम से जाना जाता है। होलोकोउस्ट का खण्डन पर प्रतिबंध पहली बार 1945 के तुरंत बाद जर्मनी और ऑस्ट्रिया में शुरू हुआ था, उस वक्त वहाँ नाजियों के पुनः प्रवर्तन का गंभीर भय था। पर आज, कम से कम दस यूरोपीय देशों में किसी न किसी तरह से होलोकोउस्ट का खण्डन को गैर-कानूनी घोषित कर दिया गया है।

अब मुझे स्पष्ट करने दें , होलोकोउस्ट की स्मृति अत्यंत महत्व है। मैं यह भी कहना चाहूंगा कि शब्द के धर्मनिरपेक्ष अर्थों में यह मेरे लिए व्यक्तिगत रूप से यह पवित्र है। मेरे लिए, यह केवल इस बारे में नहीं है कि हमने यूरोप में 1945 के बाद से क्या किया है, लेकिन उदार अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था का निर्माण करने के लिए बड़ी परियोजना, गहरे स्तर पर यह है, कि सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहे हैं कि वह कुछ फिर कभी नहीं हो। लेकिन कानून द्वारा लोगों पर इसका इनकार करने के लिए प्रतिबंध लगाना कि होलोकोउस्ट के बारे में पूरी तरह से गलत तरीके से हुआ है।

ऐतिहासिक सबूत के अपरिहार्य निकाय इस दावे का खंडन करती है कि यूरोप के यहूदियों का सामूहिक नरसंहार नहीं हुआ था। यदि कोई सभी सबूत का विश्वास नहीं करता है, उन्हें केवल इस बिनाह पर आश्वस्त नहीं किया जाएगा कि वहाँ का कानून ऐसा कहता है। यही अच्छा है कि, वे डर के कारण सार्वजनिक रूप से वह बात नहीं कहेंगे जो वे निजी तौर पर कहते हैं। जब 2006 में ऑस्ट्रिया इतिहासकार डेविड इरविंग के होलोकोउस्ट के खंडन के लिए कैद कर लिया गया था, यह केवल उसे मुक्त भाषण के लिए एक शहीद के रूप में खड़ा करने में सक्षम हुआ था।

प्रतिबंधित शाफ्ट और दोहरे मानदंड

ष्भाषण नफरतष् के अन्य रूपों के अनुसार, [¬P४ .मेरे परिचय के प्रासंगिक अनुभाग के लिए लिंक,, वहाँ विकृत शाफ्ट का प्रभाव भी मौजूद है। अन्य समूहों का कहना है, ष्यदि वहाँ शहादत को एक पवित्र प्रतिबंध के रूप में बुलंद किया जाएगा, हमारा भी होना चाहिए।ष् यह वही है जो यूरोप में हुआ है।

1995 में, तुर्क शासन के अंतिम वर्षों में आर्मीनियाइयों पर भयानक उत्पीड़न बरपाया गया जिसे अंतरराष्ट्रीय कानून में परिभाषा के अनुसार  “नरसंहार” के रूप में सही ढंग से वर्णित नहीं किया गया, पर बहस करने के लिए तुर्क विशेषज्ञ बर्नार्ड लुईस को एक फ्रेंच अदालत ने दोषी करार दिया था। 2007 में, एक तुर्की नेता और पत्रकार दोगू पेरिनेक को स्विट्जरलैंड में सजा सुनाई गई थी, जो आर्मीनियाई को जो कुछ हुआ वह नरसंहार था, इनकार करने से रोकने के लिए कानून है। इस बीच, तुर्की में ही नोबेल पुरस्कार विजेता लेखक ओरहान पामुक को यह सुझाव देने के लिए मुकदमा चलाया गया था कि – एक स्विस पत्रिका के साथ एक साक्षात्कार में – आर्मीनियाई को जो कुछ हुआ वह नरसंहार था। जो आल्प्स में राज्य-विहित सच है वह अनाटोलिया में राज्य-विहित झूठ है।

जब एक नेकनीयत जर्मन न्याय मंत्री को जबरन यूरोपीय संघ फ्रेमवर्क निर्णय के माध्यम से तय करवाया गया कि राष्ट्रों के सभी सदस्य को ऐसे ऐतिहासिक अत्याचारों के इनकार को गैर-कानूनी घोषित कर देना चाहिए, उसे पूर्वी यूरोपीय राज्यों द्वारा दिए गए सुझाव का सामना करना पड़ा था कि कम्युनिस्ट सर्वाधिकारवाद की भयावहता को नकारना भी गैर-कानूनी घोषित किया जाना चाहिए। हंगेरी संसद ने 2010 में होलोकोउस्ट के खंडन से इनकार को गैर-कानूनी घोषित करने का कानून  पारित किया। बाद में उस वर्ष, कि संसद में एक नये बहुमत ने कानून के सूत्रीकरण उन्हें सजा दें, जो राष्ट्रीय समाजवादी या साम्यवादी प्रणालियों द्वारा प्रतिबद्ध नरसंहार से इनकार करते हैंष् को बदल दिया। और इसलिए ऐसा ही चला आ रहा है।

वहां दोहरे मानकों का व्यापक आरोप है। कुछ मुसलमानों का कहना है, ष्तो आप यूरोप, ईसाइयों, यहूदियों, प्रबुद्धता उदारवादी, कानून द्वारा रक्षा करते हैं,  आपके लिए सबसे पवित्र क्या है – होलोकोउस्ट की स्मृति – लेकिन इस पर जोर देते हैं कि हम मुसलमानों को इसकी अनुमति दे देनी चाहिए जो हमारे लिए सबसे पवित्र है – पैगंबर मोहम्मद की स्मृति और छवि –  कार्टून और दुरुपयोग के विषय से संबंधित। आपके लिए एक नियम और हमारे लिए दूसरा।ष् ऐतिहासिक तथ्यों और धार्मिक विश्वास उचित रूप से तुलनीय नहीं हैं, लेकिन उनके पास निश्चित रूप से एक पक्ष है। इस मिश्रित दुनिया में, हमें लगातार एक दिशा या अन्य में रहना चाहिए। अगर हम दुनिया के सभी प्रतिबंध को एक साथ लाएं, वहाँ बहुत कुछ कहने के लिए बाकी नहीं रहेगा।

यह स्थिति आधिकारिक संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार समिति व्याख्या के अनुच्छेद 19 द्वारा समर्थित है, जो स्पष्ट रूप से कहता है, ष्जो कानून ऐतिहासिक तथ्यों के बारे में राय की अभिव्यक्ति को दंडित करता है.  दायित्वों के साथ असंगत है कि राज्य पर नागरिक और राजनीतिक अधिकारों पर अंतर्राष्ट्रीय प्रसंविदा लागू होता है।“

प्रतिबंध रहित का अर्थ “कुछ भी होता रहेगा” नहीं है

इसमें से कोई भी एक पल के लिए सुझाव नहीं देता है कि इतिहास, या ज्ञान की कोई भी अन्य शाखा की ऐसी कपट, स्वीकार किया जाना चाहिए। इसके विपरीत उनका सख्ती से स्वतंत्र और खुली बहस में लड़ा जाना चाहिए। एक बड़े झूठ के सर्वाधिकारवाद के साथ एक सदी के अनुभव द्वारा गंभीर कर दिया गया है, हम अब 17 वीं सदी के अंग्रेजी कवि जॉन मिल्टन की सच के लिए विजय का गीत के शानदार आशावाद को साझा नहीं कर सकते हैं: उसके और कपट में हो बाहुयुद्ध, जो कोई सत्य को बदतर स्थिति में डाले, एक मुक्त और खुले संघर्ष में? लेकिन कपट का सामना करने का कोई बेहतर तरीका अभी तक नहीं पाया जा सका है।

यह भी सुझाव नहीं देता है कि राज्य द्वारा अनुमोदित या वित्त पोषित स्कूलों में झूठे दावे करना सिखाया जाना चाहिए। इस सिद्धांत का अब यह तात्पर्य नहीं है कि जापानी पाठ्यपुस्तकों में द्वितीय विश्व युद्ध में जापानी बलों के संचालन का साफ-सूथरा वृत्तांत देने की तुलना में सृष्टि-रचना सिध्दान्त पब्लिक स्कूलों में सिखाया जाना चाहिए। व्यक्तिगत माध्यमों को पृथक करना चाहिए कि कैसे ज्ञान का व्यापक प्रसार करना चाहिए। मुख्य पृष्ठ पर कैसे एक गंदा बम बनाया जाए या कैसे आत्महत्या की जाए, के बारे में जानकारी नहीं देने का यह एक प्रभावशाली मामला है।(गुगल के खोजी अभियंता वास्तव में इस पर स्वतः पूर्ण सुझाव जमा करते हैं, जिससे कि, उदाहरण के लिए……….वाद-विवाद का आगमन,) ये संपादकीय विकल्प निजी शक्तियों द्वारा किया गया हैं।

एक दक्षतापूर्ण सिद्धांत

इस मसौदा सिद्धांत के शब्द सावधान हैं। यह केवल कहने के लिए है कि वहाँ कोई प्रतिबंध नहीं होना चाहिए – पूर्ण रोक के अर्थों में, जो एक आक्रामक शक्ति द्वारा लागू है, जहां कोई स्वतंत्र रूप से विकल्प उपलब्ध नहीं है। पहले के एक मसौदा में कहा गया है कि ज्ञान की खोज में कोई प्रतिबंध नहीं होना चाहिए। हमारे कुछ विशेषज्ञों ने दृष्टि आकर्षित करते हुए कहा कि हमारे शोध और सभ्यता में ऐसा कोई प्रतिबंध है, जिन्हें शायद उन पर निर्भर रहने को  कहा गया है। उदाहरण के लिए, हम मनुष्य पर किसी प्रकार के प्रयोग की अनुमति नहीं देते हैं, जैसा कि नाजी सबसे अधिक दहला देनेवाला अभ्यास करते हैं। तो हम इसे ष्ज्ञान की चर्चा और प्रसारष् के लिए बदल देते हैं।

यहां तक कि सावधानी से इस तरह शब्दों में, हमारा पांचवां सिद्धांत दक्ष है। अंतर के साथ जीने की तरह, ज्ञान की स्वतंत्र चर्चा और प्रसार के साथ जीना मुश्किल है।

यहाँ एक छोटा सा उदाहरण प्रस्तुत है। 2005 में, दुनिया के सबसे बड़े विश्वविद्यालयों में से एक के अध्यक्ष के रूप में, अर्थशास्त्री लैरी सम्मर्स ने सम्मेलन में बल से चिंतन किया कि क्या कारण है कि विज्ञान और इंजीनियरिंग के क्षेत्र में वरिष्ठ शैक्षणिक पदों पर पुरुषों की तुलना में महिलाएं कम हैं। हालांकि उन्होंने गैर-राजनयिक रूप से कहा था, लेकिन असावधानी से नहीं  – और उन्होंने यह बार-बार चेतावनी दी कि उनकी परिकल्पना गलत साबित हो सकती हैं। विवाद का एक तूफान शुरू हुआ, जो उनके हार्वर्ड के अध्यक्ष पद से इस्तीफे देने के बाद ही समाप्त हुआ। जाहिर था कि केवल एक सम्मेलन की बात से यह कहानी कुछ और अधिक भी कहती है, लेकिन केवल पढ़कर कि सम्मर्स ने क्या कहा था, मुझे लगता है कि यह सबूत-आधारित ज्ञान के मुक्त, उन्मुक्त मस्तिष्क, निडर चर्चा की तरह था जो किसी के इस्तीफा देने को बढ़ावा नहीं दे सकता। एक बार देखें और हमें बताएं कि आप क्या सोचते हैं।

इसके अलावा मुक्त भाषण वाद-विवाद पर, यह मसौदा सिद्धांत, और इसके लिए मेरा परिचय, इसके विपरीत सबूत, काउंटर तर्क और संशोधन के अधीन से संबंधित है। यह स्वयं विरोधात्मक हो सकता है जहां उसे ऐसा नहीं होना चाहिए।

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Comments (14)

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  1. “We require and create open, diverse media so we can make well-informed decisions and participate fully in political life.”
    Reading threw the explanation and the discussion sparked by it, I have several considerations.
    Firstly, we could consider if the right of free speech should entail a right to mislead or not. Should I be free to try and convince others with arguments that I know are bias or false? If not, should the right of free speech go hand in hand with the duty to inform oneself about the topic and the arguments being used? (Do keep in mind, that this would limit free speech to people with specific intellectual capabilities, an academic background and time.)
    Secondly, we should consider if ‘the media’ have different duties and rights then the individual? Just as confidentiality is inherently a part of professions in the law or medical sector, should the search and presentation of non-bias, objective facts (if there is such a thing) be a part of journalism? If so, where do we draw the line between an individual and a ‘member of the media’?
    Thirdly, what are the rights and duties of people receiving information? Who is responsible for filtering out bias information, the media or the people that choose to use that medium? Does this go hand in hand with a right of education and a right to learn how to think critically? As mentioned earlier, some people in China don’t see the benefit of free media, have their rights been violated? To what extent would we be pushing a ‘western’ education on different cultures?

  2. I particularly like number 3, because, despite the huge variety of corporate media organizations, they often follow a very particular kind of narrative which defeats the whole purpose of diversity.

  3. We require and create open, diverse media so we can make well-informed decisions and participate fully in political life.
    Similar to acellidiaz I agree with the statement that I feel like this hasn’t been phrased correctly. This would be the ideal situation, yet unfortunately there is a difference in the ideal and the realistic.

    The recent election of Francois Hollande in France; The “Président Normale”, however in my opinion he’s “Président irréaliste” was a clear sign of society not making a well informed decision eventhough information was widely available. I am of the opinion that the vote was more an anti-Sarkozy vote, rather then a vote based on a political agenda. Policies attempting to make France the only country in the EU to decrease its pension age and where on earth are you going to get 60000 ‘good ‘teachers from to help substandard schools are simply unrealistic and only takes common sense to realize that this will not be obtainable without causing further problems.

    I don’t think we will ever be able to make well informed decisions as a whole society. Simply as educational boundaries exist and interest levels with politics vary. This is an ideal that we can strive to achieve but will never be exactly the case.

  4. I, personally agree with the principle, however after a semester in China I came across a view where people do not find it necessary to have the right o participate in political life. Moreover, they believe that free media is harmful for their reality. I wonder what could said in response to that?

    • Yes I agree with this. In China people are not subjected to the same degree of freedom of media or democracy and as a result the general public do not feel the necessity of it. However, China has limited certain restraints such as allowing more people to use the internet. Of course, the information is highly censored but even still there are approximately 500 million people online and this is the first generation to experience this extent of social freedom; there exists a freedom of expression that you don’t get in other forms of media. This leads to higher expectations and even exposes corruption, putting a lot of pressure on the government. Moreover, it forces me to raise the question: is it harmful or not? Will it ruin or benefit the state of China?

      • Also even though the public may not believe in free media to the fullest extent it is crucial to mention this point: in my opinion it is not so much the government people are dissatisfied with, rather the corruption and the inability to actually reach vital information. Moreover, the more China develops, the more these problems will surface and the government will be forced to deal with them. There is hence a paradox: people may not feel the necessity of complete freedom, yet they want a system without corruption and without censorship. Is this possible?

  5. We require and create open, diverse media so we can make well-informed decisions and participate fully in political life.
    I personally do not disagree with the essence of this principle but with the way how it has been stated. I could be able to stand against a principle that in execution will be ideal for the development of a representative democracy. It is within a democratic context how I understood it.
    Nevertheless, I have my doubts in how we are actually able to create new diverse media and how we are able to “fully” participate in political life. When creating new diverse media, I believe it is important to take into account the eminent relationship that exists between power and knowledge. Although we live in a highly complex and globalized world, in which billions of persons are interconnected through different kinds of media, I am very sceptic in the power that independent media has. And with this term I refer to all type of media that is not predominant: social networks, blogs, and home-made videos, among others. Some people may say that great and recent movements of change, such as the Arab Spring, emerged thanks to the immediateness and spread-capacity of social networks like Twitter or Facebook. However, the final international image of the revolutions, the words that mostly ignited global debate about what was going on in the Middle East, was lastly framed by big TV Networks such as Al-Jazeera, BBC and CNN. These three mainstream media giants, with their own independent interests, certainly chose what images and what comments to broadcast. Together with others, they constitute some kind of oligopoly when we talk about accessing to information about what is going on in the world. It is very hard for me to completely trust in their intentions of delivering the Truth –if there’s actually one.
    I believe that there is actually little possibility for an independent or rising media network to win a space in the media scene. Taking an example of my home country, Venezuela, where there is a clear polarisation of the media, the chances for a more “plural”, “balanced” or “impartial” media network for winning the attention of the public are minimal. For instance, I can compare the success of two relatively new websites. The first one is called redigital.tv and was founded by the family of a former independent candidate for Mayor of Caracas, the capital. The second one is lapatilla.com which was founded by the former director of now the biggest TV channels that opposes to the current government, Globovision. Both were founded around 2008 and 2010. Today, lapatilla.com counts with one million followers in Twitter: a figure that cannot be compared to the amount of followers of redigital.tv. When speaking to my friends, lapatilla.com belongs already to the common word: everybody reads their sometimes vain and superficial articles about sex, celebrities or astrology, together with the usual portion of politics. This is different from redigital.tv, that not only does not count with the same amount of attention –for not a lot of people know about it-, but it still lacks clients for advertisement in their website. Obviously, the founder of lapatilla.com, Alberto Federico Ravell, counts with a wider range of contacts in the business because of its former role in Globovision. At the end, the media works like the market. Only the top dogs survive.
    Regarding the last part of the principle and possibility for citizens to make well-informed decisions and fully participate in political life; I find it difficult to not relate it with the principles that define a democracy. For what do we mean by “full” participation in political life? Is the principle referring to a direct democracy, where active citizens that dedicate their lives to comprehend the characteristics of their society or nation in order to give a strongly based argument or vote? Or does it refer to a representative democracy, where the citizen, among many of his lifetime activities, dedicates a portion of his time to think about politics and about the best way to live together in society? When I read the principle, I understood it under the principles of a direct democracy. Which in modern times, when we have states of millions of people, I believe it is impossible.
    But if it actually referred to the second interpretation, how is it possible to “fully” participate in political life if this is not the priority of all the citizens? What are the limits that contain the meaning of this adverb? Is it “fully participating” just watching the news and vote for a representative that takes care of making political decisions? If this is the case, then yes. I would agree. Otherwise, I believe the principle needs clarification. I would put it this way:
    “We require and attempt to create open, diverse media so we can make well-informed decisions and participate as much as it is possible in political life”

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'वाक्-स्वतंत्रता पर चर्चा' ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के सेंट एंटनी कॉलेज में स्वतंत्रता के अध्ययन पर आधारित दह्रेंदोर्फ़ कार्यक्रम के अंतर्गत एक अनुसन्धान परियोजना है www.freespeechdebate.com

ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय