01जीवन

बिना किसी भी बाधाओं के सभी मनुष्य को अपने विचार प्रकट करने की तथा विचारो के आदान-प्रदान और उसे प्रसारित करने की पूरी आजादी है

हम अपने आप को व्यक्त करने के लिए स्वतंत्र क्यों होने चाहिए?  

पूरे पुस्तकालय इस सवाल को संबोधित करने के लिए समर्पित किये गए हैं. हम यहाँ चार महत्वपूर्ण तर्कों के साथ शुरू कर रहे हैं:

1.मानव आत्म पूर्ति :भाषण और काल्पनिक विचारों की शक्ति मनुष्य को अन्य जानवरों से अलग करती हैं.  अगर हम अपने विचारों और भावनाओ को न प्रकट कर सकें तो हम अपनी पूर्ण व्यक्तिगत मानवता नहीं महसूस कर सकते हैं.

2. सत्य: जब तक हम प्रासंगिक तथ्यों, राय और तर्क को उजागर न कर पाएं तब तक हम सच को प्राप्त नहीं कर सकते.

3. अच्छी सरकार: हम समाज को तब तक संचालित नहीं कर सकते जब तक हम पूरी आज़ादी से समाज  के भीतर उपलब्ध हर विचार और नीति विकल्प के बारें में चर्चा न करें .और इसके बिना हम प्रभावी रूप से अपनी  सरकार  पर नियंत्रण नहीं कर सकते ( सिधांत 3 देखें).

4. अंतर के साथ रहना:  हम एक ऐसी दुनिया में है जिसमें सब एक दुसरे के पडोसी बनते जा रहे हैं , क्योंकि या तो हम एक ही स्थान में हैं या वस्तुतः, इंटरनेट और मोबाइल उपकरणों के माध्यम से ऐसा हो रहा हैं.  [] के बारे में के प्रासंगिक अनुभाग. इसलिए हमें ये समझने की आवश्यकता है की हमारे पदोसो हमसे भिन्न क्यूँ है और इस भिन्नता का उनपे क्या असर पढता है.  मानव अंतर के बारे में अहिंसात्मक ढंग से खुली चर्चा करना विविधता को समझने का सबसे अच्छा तरीका है. (सिद्धांत  4, 6 और 7 देखें)

अनुच्छेद 19 – (करीब- करीब) सार्वभौमिक आदर्श

हमारा मसौदा पहला सिद्धांत, “हम” आकार  में [के बारे में कड़ी],  1948 मानव अधिकारों की सार्वभौमघोषणा के अनुच्छेद 19 का एक सरलीकृत संस्करण है. इस सिद्धांत को 1966 नागरिक और राजनीतिक अधिकार (जो की स्वतंत्र अभिव्यक्ति पर वैध प्रतिबंध के विभिन्न प्रकार दिखाता है) पर अंतर्राष्ट्रीय वाचा के अनुच्छेद 19 में विस्तारित किया गया था. यदि आप और अधिक सूचना चाहते हैं, तो यहाँ राष्ट्रमानवाधिकार समिति के अनुच्छेद १९ पर एक उल्लेखनीय व्याख्या है.

दुनिया में अधिकांश राज्यों ने इसको अपनाया है- हालांकि कुछ शर्तों के साथ. चीन ने हस्ताक्षर तो किए है, लेकिन पुष्टि नहीं की, जबकि  सऊदी अरब और बर्मा ने हस्ताक्षर भी नहीं किए हैं.

सिद्धांत के रूप में यह वाचा उन सभी राज्यों पर कानूनी तौर से बाध्यकारी है जिन्होंने इस पर हस्ताक्षर किए हैं और इसकी पुष्टि भी की है. वास्तव में, जैसा कि हम सभी जानते हैं, कई सरकारें अपने वादों पर खरी नहीं उतरतीं. इसी लिए हमारा पहला सिद्धांत हमें अपनी सरकारों से यह पूछने का अधिकार देता है की वेह अपनी प्रतिबद्धताओं का उल्लंघन क्यों कर रहे हैं.

उन 114 राज्यों के नागरिकों के लिए, जिनकी सरकारों ने इस वाचा के पहले वैकल्पिक प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किए है, उनके लिए एक औपचारिक मार्ग है. यह नागरिक सीधा संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार समिति में जाकर कह सकते हैं की उनकी सर्कार ने इस वाचा के अनुच्छेद 19 का उल्लंघन किया है. यहाँ एक दिलचस्प बात है कि अमेरिका और ब्रिटेन ऐसे दो देश हैं जिन्होंने इस प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर नहीं करा हैं.

यूरोप में, मानव अधिकार पर यूरोपीय कन्वेंशन के अनुच्छेद 10 में भी कुछ ऐसा ही कहा गया है. यदि आप यूरोपीय परिषद के 47 सदस्य राज्यों में से किसी में भी रहते हों, तो आप स्ट्रासबर्ग में मानव अधिकार के यूरोपीय न्यायालय में अपने मुक्त भाषण अधिकारों के उल्लंघन के खिलाफ निवेदन कर सकते हैं. यहां तक कि बुरी यूरोपीय सरकारें  स्ट्रासबर्ग न्यायालय के निर्णय से शर्मिंदा की जा सकता है, और कभी कभी वे अपने तरीके भी बदलती हैं. उत्तर और दक्षिण अम्रीका के लिए भी, एक ऐसी अदालत है, लेकिन यह बहुत कमजोर है, क्योंकि इसके निर्णय किसी भी राष्ट्रीय अदालत पर बाध्यकारी नहीं हैं. अन्य महाद्वीपों में इसकी तुलना करने के लिए कुछ भी नहीं है.

इसके अलावा, अलग अलग क्षेत्रों के लिए चार अंतरराष्ट्रीय राप्पेर्तौर  भी  हैं. फिलहाल ये हैं फ्रांक ला रुई: विचार और उसकी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार पर संयुक्त राष्ट्र के विशेष राप्पेर्तौर; कातालिना  बोतेरो, अमेरिकी राज्यों के संगठन में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए विशेष राप्पेर्तौर; दुन्जा मिजतोविक , संचार माध्यमों की स्वतंत्रता पर यूरोपीय प्रतिनिधइयों के सहयोग और सुरक्षा के संगठन के विशेष राप्पेर्तौर; और पैंजी त्लाकुला: स्वतन्त्र अभिव्यक्ति और सूचना के अधिकार पर अफ़्रीकी मानव अधिकार संगठन के विशेष राप्पेर्तौर.

स्वतन्त्र और सक्षम: “सक्षम” शब्द: हमने यहाँ एक महत्वपूर्ण शब्द जोड़ा है जो उन उत्तम घोषणाओं में गैरहाजिर है- यह शब्द है “सक्षम”. सुनने में बड़ा अच्छा है की आप  सैद्धांतिक रूप से आपको क्या पसनद हैं वह कहने के लिए स्वतंत्र है लेकिन अगर उस इलाके के गुंडे, चाहे वो अपराधी हो, गुप्त पुलिस या धार्मिक उग्रवादी – आपके ऐसा कहने पे मार सकते है तो आपकी स्वतंत्र केवल कागज़ी है. अगर आपको इन्टरनेट उपलब्ध न हो तो ये अधिकार कोई मायिने नहीं रखता. (सभी के लिए इंटरनेट की उपलब्धता टिम बर्नर्स ली और उनके वर्ल्ड वाइड वेब कंसोर्टियम का महान उद्देश्य है , अधिक सी2 में). अगर आपके देश के संचार माध्यम कुछ अमीर पुरुषों, कंपनियों, या समूहों के कब्ज़े में हों, या आपके पास पर्याप्त जानकारी न हो, या उस जानकारी की व्याख्या करने के लिए और अपने विचारों को व्यक्त करने के लिए पर्याप्त शिक्षा न हो, तब भी ये अधिकार कोई मायिने नहीं रखता (सी ३ देखें).

हमारे कहने का मतलब ये है कि – और यह सोच सभी सिद्धांतों के लिए केंद्रीय हैं — स्वतंत्र अभिव्यक्ति का वास्तव में शक्ति से उतना ही बाधा ही रिश्ता हैं जितना की कानून से हैं. प्रभावी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए आपको सशक्त और हकदार दोनों होना ज़रूरी हैं . असली सवाल यह हैं की हमें सूचना के आदान प्रदान में ‘सक्षम’ होने के लिए किन चीज़ों की आवक्ष्याकता हैं. इससे वास्तव में पाना और भी कठिन हैं.

“भाषण” क्या है? और “अभिव्यक्ति”?

“स्वतन्त्र अभिव्यक्ति पे बहस” एक आशुलिपि है. “भाषण” या “अभिव्यक्ति” शब्दों से हम हर प्रकार की अभिव्कक्ति को दर्शाना चाहते हैं, जैसे: लेखन, चित्र, गाने, वीडियो, फिल्म, झंडे (और झंडों का जलना), नाटक, प्रदर्शन, भूख हड़ताल, जुलूस, धार्मिक रीतियाँ और स्कार्फ, बैज जैसे  पोशाक के रूप.  “वाक्-स्वतंत्रता” का ये भी मतलब है की आपको बिना कुछ कहे अपनी भावनाओं को प्रकट करने का हक़ है (जैसा की पहले के ज़माने मिएँ गांधीजी और आज के ज़माने में अन्ना  हजारे ‘मौन व्रत’ के द्वारा करते हैं).

और अपनी भाषा में …

अपने आप को व्यक्त करने के लिए स्वतंत्र होने के नाते सब को अपनी खुद की भाषा का उपयोग करने में सक्षम होना ज़रूरी है. एक राज्य, संगठन या कंपनी अपने नागरिकों, सदस्यों, या कर्मचारियों के लिए एक आम भाषा जानना और कुछ संदर्भों में उसका उपयोग करना आवश्यक कर सकती  है. ऐसी एक से अधिक भाषाएँ भी हो सकती हैं (जैसा की कनाडा और भारत में है). आम तौर पर वे लोगों को अपनी मातृभाषा से कोई अन्य भाषा का प्रयोग करने को मजबूर नहीं कर सकते. दृश्य भाषाओं, पोशाक के रूपों और सामूहिक प्रतीकों का उपयोग भी वे बहुत अछे कारण दे कर ही रोक सकते हैं. और अगर  वे ऐसा करते हैं, तो इसे स्वतन्त्र अभिव्यक्ति के मूल सिधान्तो का उल्लंघन माना जाना चाहिए.

अगर आपके द्वारा प्रदान की गयी सूचना मैं प्राप्त नहीं करना चाहता तो?

इस बुनियादी सिधांत में शब्दो के तीन अहं जोड़े हैं: ‘स्वतन्त्र और सक्षम’ , ‘आदान और प्रदान’ , ‘सूचना और विचार’. ‘स्वतन्त्र और सक्षम’ के बारे में हम बात कर चुके हैं- यह कानूनी अधिकार और प्रभावी शक्ति के बीच का अंतर दर्शाते हैं. ‘आदान और प्रदान’ भी एक महत्त्वपूर्ण अंतर को प्रकट करते हैं. एक तरफ उस व्यक्ति की स्वतंत्रता है जो कुछ कहना चाहता है- चाहे वो वक्ता, लेखक, ब्लॉगर, चित्रकार, प्रदर्शक या कलाकार हो- और दूसरी तरफ सुनने वाले की स्वतंत्रता है- चाहे वो पाठक, श्रोता, इंटरनेट उपयोगकर्ता, या दर्शक हो. कभी कभी वक्ताओं और श्रोताओं के बीच तनाव भी होता है. मैं शायद कोई ऐसी चीज़ बोलना चाहू जो आप सुनना नहीं चाहते.

तो जहाँ तक संभव हो, हम दोनो को चुनने के लिए स्वतंत्र होना चाहिए. उदाहरण के लिए, इस साइट पर अगर कोई ऐसी चीज़ हो जो हमारे मुताबिक़ महत्त्वपूर्ण हैं, लेकिन जिसे हम जानते हैं की कुछ लोग देखना नहीं चाहेंगे, तो हम उसे सीधा वेबसाइट पर दिखाने के बजाय आपको उसकी लिंक पर क्लिक करके उसे देखने का विकल्प देंगे. तो अगर आप डेनमार्क के समाचार पत्र में प्रकाशित किए गए नाबी मुहम्मद को दर्शाने वाले कार्टून को देखना चाहते हैं (जिसकी बजह से पूरे विश्व मैं हंगामा हो गया था), तो यहाँ क्लिक कीजिये. और अगर इसे देखने से आपकी धार्मिक भावनाओ को ठेस पहुंचेगा, तो लिंक पर क्लिक मत कीजिये. चयन का अधिकार पूरी तरह आपके हाथोँ में है.

लेकिन इसमें कई मुश्किल मुद्दे भी हैं. जैसे की विकिपीडिया खुद ही एक छाविफिल्टर हैं, जो वयस्क उपयोगकर्ताओं – बच्चों के माता पिता – को कुछ श्रेणियोंको न देखने का विकल्प देता हैं. क्या यह सही है की ज्यादातर मीडिया हमें युद्ध और यातना की सबसे भयावह छवियां नहीं दिखाता? क्या आपको नहीं लगता की हमारा ऐसे चित्रों से सामना करना ज़रूरी हैं ताकि हम उस्सकी भीषणता महसूस करें और आगे जहाँ तक हो सके उस्सको रोकने की लिए कार्य करें? और ऐसे विशाल होर्डिंग का क्या जिनका आप सडकों पे अन धेका नहीं कर सकते या  पब्लिक स्कूल की कक्षाओं में दर्शाए गयी ऐसे कई धार्मिक प्रतीक.

सूचना की महत्वता

अनुच्छेद 19 की तरह, हमारे मसौदा सिद्धांत भी सूचना की परिभाषा में “सूचना और विचारों” को शामिल करता हैं. इसमें कोई आग या पानी की तरह स्पष्ट भेद नहीं है, लेकिन एक अंतर है. सूचना न केवल भौतिक और मानव दुनिया के तथ्य हैं, मगर यह ऐसा डेटा भी है जो सरकार, कंपनियां, धार्मिक संसथान, और व्यक्ति अक्सर गुप्त रखना पसंद करते हैं (५ देख, 8 और 10) . सूचना की स्वतंत्रता वास्तव में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं है, लेकिन इनके बीच एक बारीक सम्बन्ध हैं. संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार समिति द्वारा अनुच्छेद 19  की आधिकारिक व्याख्या में  शामिल हैं  ” जन समन्धि संस्थाओं से सार्वजनिक सूचना का अधिकार’. लेकी वास्तव में इसका क्या मतलब है?

जर्मन संविधान कहता हैं की लोग अपने आप को ‘ आम तौर पर सुलभ स्रोतों’ से सूचित करने के लिए मुक्त होने चाहिए. लेकिन ‘आम तौर पर दुर्गम स्रोतों’ का क्या? मैं कैसे प्रभावी रूप से युद्ध में जाने के लिए अपनी सरकार पे सवाल कर सकती हूँ  जब हमारे नेता ही कहें की, “हमारी खुफिया संस्था हमें बताती है कि दुश्मन ने सामूहिक विनाश के लिए हथियार तैयार करे हैं” – लेकिन हमें यह जानने का हक नहीं की यह खुफिया सूचना है क्या? सूचना की असममिति क्षमता की असममिति है.

सीमाओं के बावजूद!

और अंत में महतवपूर्ण है यह बताना की, अनुच्छेद 19 में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता ‘ सीमाओं के बावजूद’ हैं. अधिकतर अंतरराष्ट्रीय मानव अधिकार सम्झोत्तें कहते हैं की , ‘ हम राज्य ए या बी, अधिकार अक्स और वाई को सत्यनिष्ठा से अपनी सीमाओं के अंदर सम्मान करेंगे’ . लेकिन यह एक ऐसा मानव अधिकार हैं जो कहता है की ‘ हम सीमाओं की दोनों और सूचना और विचारों की धारा को बहने की अनुमति देते हैं’. १९४८, की हिसाब से यह एक उल्लेखनीय बात

जब अंतरराष्ट्रीय प्रसारण अपनी प्रारंभिक अवस्था में था और इंटरनेट एक विज्ञान कथा थी.  वर्तमान में देश विदेश के बीच सूचना और विचारों को रोकना सरकारों के लिए काफी कठिन हैं. मगर कुछ सरकारें अभी भी सूचना के आदान प्रदान पर रोक लगाती हैं ( पि २ देखें ).


Comments (11)

Google अनुवाद द्वारा स्वचालित मशीन अनुवाद प्रदान किया जाता हैं. यह आपको बताता है की योगदानकर्ता क्या कहना चाहता हैं, लेकिन इसका एक सटीक, सूक्ष्म अनुवाद की तरह भरोसा न करें.

  1. I’m a little confused by the website, I wanted to start a discussion – but I’ll add to this instead.
    I don’t agree with the principle. I’m a bit surprised that anyone does! here in the UK I have a wide range of legal and social bans on what I can say. These bans are quite widely accepted and the free speech debate is to some extent a tool to criticise the values held by other non-western societies. Let me give some examples:
    1) Should I be free to publish information about a defendant on trial?
    2) Should I be free to name a rape victim? comment on his or her behaviour? while the case is in court?
    3) Can I publish research results on skin colour variation between races? [yes] Can I do the same about conginitive attributes? – not if I want a job in a UK or US University?
    4) Can I question the roles of men and women in modern society? And still be allowed conduct job interviews as part of my job?
    6) Can I talk openly about my religious views and evangelise?
    I’m not talking about National security issues, but that we have other widely accepted, largely unchallenged laws and social rules which threaten the careers, livliehood and freedom of transgressors. I don’t think India or Arab states have more rules, just different ones.
    In many cases the rules are well-meant and intended to support justice or promote admirable changes to society. But make no mistake, they stop free expression and publication of some information.

  2. “Join us, wherever you are, for a global conversation. Read and criticise our 10 draft principles. Explore controversial examples. Hear the thoughts of others. Have your say…”

    An interesting initiative. Yet prior to embarking upon any endeavour, might it not prove prudent to precisely categorise the intention underlying the quest? As well as identifying what is, and what can be done to overcome, the greatest impediment to securing that desired accomplishment?
    In this case, is discussion the goal? Or is this merely a device, deployed toward attainment of an inestimably higher value outcome? Resolution of these queries, necessitates use of questions specifically designed to identify some fundamental requirement universal to us all. That effort then applied, coalesces as a single vector. Plus, exposure of an obvious but un-addressed flaw in our physiological construction. Which has, until now, frustrated major advancement for our kind.

    Q1. What is such a crusade intended to achieve?
    Potentially, there are as many responses to that conundrum as there are individuals to contrive them. Yet not one of those explanations, being wholly dependant or entirely reliant on the presence of humanity, can manifest without the existence of humanity. So, might ensuring the continuation of the species constitute the common purpose pursued?

    Q2. What prevents a realisation of the above?
    To function effectively in reality, human appreciations have to accommodate every aspect of existence they encounter. Else-wise, conflict will ensue from that plethora of disparate ‘understandings’ arrived at through selective appraisal. This inherent constructional defect is unfortunately not correctable. But what if, once registered in collective consciousness, it could be compensated for?

    Free Speech Disclaimer Prefacing All Principles Of Debate.
    I, in common with all other humans (evidence for concept available on application), am not ‘plugged’ directly into reality. But rather into an ‘interpreter’ interface, whose subjective output may be genuinely mistaken for said objective experience. Consequently, what follows is but a rendition of reality together with its associated workings. Additionally, given acknowledgement of the primary principle, debate is intended to ensure that those conditions conducive to species survival are maintained. Such that an inclination to suppress open discussion, as opposed to personally forswearing involvement in it, shall signify the presence of a closed ‘comprehension’. One that will not withstand comparative testing. Being likely to unnecessarily imperil species continuance, and by extension its own possessor’s longevity. (No humans, no debatable notional constructs, invented ideologies, pseudo philosophies, or any other homo sapien-powered activity).

    There are as many ways to explain a view as there are minds to interpret it. If any particular explanatory format cannot be assimilated, it is by no means the fault of an audience. All onus rests with the presenter. Who will and must, when requested, rework their mentation from as many differing perspectives as may prove necessary to achieve comprehension and reaffirmation. Truth alone is resilient to interminable debate. Which offers a clue as to why untruth is so desperate to avoid it.

    Example:
    “Professor states that democracy “always needs debate” and that the debate “plays its role” better if there are less limitations of free speech.”
    An opportunity once presented itself to ask a politician, if he considered it vital for someone in his position to possess a firm grasp of reality. He replied in the affirmative. The next query concerned whether he believed in democracy. His response confirmed that he did. When questioned as to what democracy was, he stated fairness. This prompted pointing out that a dictionary defines democracy as, “government of the people, by the people, for the people”. Or policy selection via majority mandate. So was expressing belief in something when one didn’t know what that something was, evidence of a firm grasp of reality? Sadly he was unable to spare time to even make an excuse, before fleeing.

    Al.

  3. Adding ‘and able’ is a serious error. It opens the door to State intervention in the name of promoting freedom of expression which, as night follows day, will end up restricting it. No state willingly expends resources on promoting free speech without trying to stipulate the kinds of speech that its resources can be used for.

    Just listen to the politicians who insist that the right of free speech must be exercised responsibly. A fundamental right of free speech that protects only ‘responsible’ speech protects nothing worth having. Once those politicians are expending state funds to provide our internet connections the rest is inevitable.

    Please stick to the 1948 wording. For the internet, it cannot be bettered.

  4. ¿Cómo podemos cambiar el instinto de nuestro genoma?
    ¿Por qué la condición humana está tan lejos de la declaración de derechos humanos?

  5. I totally agree with this statement, I believe that every person should be able to express their self, I believe that every person has a purpose in life, if you look around you everything has a purpose, the trees have a purpose, the birds have a purpose, all the animals have a purpose, so human beings surely have a purpose, and the wise man is he who finds his or her life’s purpose. Human Beings have two ears, and a tongue, to hear as twice as you speak is a good thing, this helps you learn more in order to interact properly. Without communication nothing would happen, so people must communicate and be able to express their selves freely

  6. Yes, we’re all humans, we make up the basic unit of society and therefore in order for society to be free, each individual within the society must also be allowed to be free.

  7. Your comment is awaiting moderation.

    The idea of freedom as a right is quite strange because the concept of a right in itself is a myth. A right is simply a metaphysical idea that doesn’t protect one against anything. Of everything that happens there is only what comes to pass. If someone is arrested for assault it is not the right of the victim that is protected but simply the will of the government to punish. Should we have freedom? It would be nice but not our right.

  8. I’ve read recently an interview given by Professor Timothy Garton Ash for Polish magazine “Polityka” – titled “Dangerous Speech” but devoted to wider spectrum of free-speech-debate matters. Among other interesting statements, with majority of which I agree, Professor states that democracy “always needs debate” and that the debate “plays its role” better if there are less limitations of free speech. But what is this role to play – that is my question. Debate is considered a key attribute of democracy, but maybe sometimes is treated as democracy’s Sacred Cow. Is it really enough if only debate exists and continues in free and civilized manner? I’m skeptical about this. If debate hasn’t any other aim than exchange of thinking, one can expect its running wild and becoming useless (another danger for participants: GBS stated that in an exchange of thinking transaction he usually was the loser). I think that the most important factor essential for democracy as a system of majority rules, making debate sound, is a debate final aim: taking a decision by ballot, just by debating body. There is an opinion that natural extension – or rather 2.0 Variant – of the first watchword of modern democracy “no taxation without representation” is the formula “no obeying a decision without to vote on it” that can be fulfilled via Internet. I agree with this opinion, and I’m convinced that in this century cybernetic assisted direct democracy, with truly fruitful debates, will become real. More arguments in my article “Cyberdemocracy as a future product of political systems engineering” http://www.sapub.org/journal/search.aspx?doi=10.5923/j.fs.20110101.02.
    Andrzej Kaczmarczyk
    Institute of Mathematical Machines, Warsaw, Poland

  9. I highly agree with this principle, and I understand how the others branch of from this one. Therefore, it is a vital one to discuss and gain a better understanding about. Personal opinions and ideas is what shapes each person as an individual and without these the world would be an extremely uniform and monotonous place. Therefore it is crucial to be able to express and communicate these ideas, even when others do not agree. Of course I admit that this is unfortunately not always the case. But as stated, we need to have the power to be able to express as well as the will. This begins by appreciating what others have to say and at the same time having the ability to accept that your own opinion is just as good as any.

  10. Thanks for this brilliant introduction to the topic. I especially appreciate to stress the signifier ‘able’ in the principle as I think that the question of power even far outweighs (!) the question of law.

  11. Hi everyone, I’m the first who comments in this section. On the one hand, I do not understand how such a site is deserted by all who have the desire to communicate and share their thoughts with anyone, freely, but soon after, I realize that everything the web has fallen upon us with a so quickly that we do not have a clear vision of what the web, or what is the chance to express themselves freely. Freedom from whom? The concept of freedom is so far away that it is difficult and self-talk. Personally, I hope for a worldwide deployment of this platform to be, regardless of whether they agree on one or more themes.
    Thanks for the idea and the opportunity.

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'वाक्-स्वतंत्रता पर चर्चा' ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के सेंट एंटनी कॉलेज में स्वतंत्रता के अध्ययन पर आधारित दह्रेंदोर्फ़ कार्यक्रम के अंतर्गत एक अनुसन्धान परियोजना है www.freespeechdebate.com

ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय