क्या न पहनें

विश्व-भर में प्रतिबंधित पहनावों का अध्ययन करते हुए मरयम ओमिदी कहती हैं की मुख्यतः महिलाएं ही रूढ़िवादी वा़स्त्रिक नियमों का निशाना बनती हैं।

2010 तक पेरिस की महिलाओं को पुरुषों के कपड़े पहनने के लिए पुलिस से कानूनन अनुमति लेनी पड़ती थी, हालाँकि इसका पालन वास्तविक रूप से कोई नहीं करता था। वक्त चलते इस दकियानूसी क़ानून का निरसन तो हो गया, किन्तु इसके एक साल बाद ही फ्रांस बुर्खे पर सार्वजनिक प्रतिबन्ध लगाने वाला पहला यूरोपीय देश बन गया – वह नक़ाब जिसे मुसलमान अपने धर्म का आवश्यक अंग मानते हैं।

परन्तु फ्रांस ऐसा एकमात्र देश नहीं है जहाँ ऐसा हुआ हो।  इस्लाम-सम्बन्धी परिधान पर प्रतिबन्ध लगाना आज विश्व की एक प्रचलित प्रथा सी बन चुकी है।  उदाहरणतः फ्रांस के अतिरिक़्त बेल्जियम व नेदरलॅंड्स में भी बुर्खा निषेधित है, हालाँकि डच सरकार के गठबंधन के टूटने के पश्चात (जिसमे गीर्ट विल्डर्स की दक्षिणपन्धी “फ्रीडम पार्टी” भी शामिल थी), इस कानून के दोबारा बदला जाने की संभावना है। इन देशों के मुकाब्ले उज़्बेकी अधिकारीयों ने अधिक जटिलता दिखाते हुए हिजाब पर केवल मौखिक परिबंध लगाया  जिस कारण इनकी बिक्री गुप्त तौर पे होने लगी। इस सन्दर्भ में महिलाओं को चोरी-छुपे हिजाब पकड़ते हुए दुकानदारों के दृश्य याद किये जा सकते हैं।

कोसोवो में भी सरकारी स्कूलों में हिजाब पर मनाही है तथा तुर्की व तुनिशिया जैसे धर्मनिरपेक्ष मुस्लिम देशों में इसे सार्वजनिक संस्थाओं में पहनने पर रोक है। न्यू यॉर्क टाइम्स के अनुसार  इस प्रतिबन्ध का परिणाम यह है कि महिलाएं न्यायालयों, अस्पतालों और संसद जैसी जगहों में नौकरी नही कर सकती। फैशन पत्रिकाओं के मुखपृष्ठ व महिला अधिकार एक्टिविस्ट ने तो हिजाब को एकसमान अपना ही लिया है, इसी न्य यॉर्क टाइम्स के लेख का यह भी कहना है की तुर्की में हिजाब के प्रति सामाजिक धारणाएं बदल रही हैं, जहाँ इसे हमेशा से निचले व अनपढ़ वर्ग से सम्बधित किया जाता था। फ्रांस से लेकर तुनिशिया तक किए गए हिजाब के  प्रतिबंधन के स्पष्टीकरण अधिकतर एक समान ही प्रतीत होते  हैं: इस्लामी कट्टरपंथिता के बढ़ाव की रोकथाम, महिलाओं का मुक्तिकरण, या फिर रोज़मर्रा तौर पर चेहरे को ढकने की निसंदेह अव्यहवहारिक्ता।

इसके विप्रीत इटली के Castellammare di Stabia नामक शहर ने गैरसामाजिक गतिविधियों की रोकथाम के चलते मिनी-स्कर्ट को  वर्जित कर दिया गया है। इस सन्दर्भ में शहर  के मेयर का यह तर्क था कि यह नया नियम नागरिकों में “शिष्टता व मिलजुलकर रहने के भाव” को बढ़ावा देगा।

विश्व के अन्य हिस्सों में भी अनुचित और उत्तेजक पहनावे पर धावा बोला जा रहा है, उदाह्रणत: इंडोनेशिया के असह  ्रांत में तंग कपड़ों पर, चैस के मैच में क्लीवेज-वर्धन करने वाले वस्त्रों पर या फिर उस चार बच्चों की माँ का अपनी उम्र के विपरीत छोटे कपड़े पहनने के कारण हैवर्सेस्टर शहर के हर पब में प्रवेश निषेधित करना। किन्तु असभ्य परिधान  की परिभाषा की एक देश से दूसरे देश पर निर्भरता का प्रमाण सूडानी पत्रकार लुबना अहमद हुसैन को २००९ में मिला जब उसे अश्लील पहनावे के आरोप के अंतर्गत एक महीने की  जेल हुई। उसका एकमात्र जुर्म धा: पैंट पहनना ।

जहाँ एक ओर अमेरिका में केवल कुछ स्कूलों और म्यून्सिपाल्टियों में सेग्गिंग (पुरुषों द्वारा कमर के बहुत नीचे पैंट पहनने का प्रचलन) वर्जित है वहीँ मुस्लिम बहुसंख्य ईरान में हिजाब पेहेनना अनिवार्य है । यह वही इस्लामी गणतंत्र है जो हर वर्ष अत्यधिक पश्चिमी पहनावे पर सख्ती के लिए कुख्यात है । तंग पैंट ? ज़्यादा छोटी जैकेट ? बालों का प्रदर्शन? यदि आप एक ऐसी स्त्री हैं जिसने इनमे से किसी भी प्रश्न पर हाँ कहा है तो यह संभव है की कभी न कभी आपको यहाँ की “मोरल पुलिस” द्वारा पूछताछ के लिए रोका गया है । ताकि पुरुष और स्त्रियों में किसी भी प्रकार का भेदभाव न हो,  ईरान  ी सरकार ने वर्ष 2011 में पुरषों के सम्मोहक (अथवा “ग्लैमरस”)  हेयरस्टाइल और  उनके द्वारा पहने गए गले के हारों को भी एक फैशन त्रासदी करार  कर दिया है।

गुयाना में आदमियों को औरतों के कपड़े पहनने की अनुमति नहीं है । लेकिन वहां की सरकार पर कटाक्ष करने से पहले फ्री स्पीच डिबेट को अपने आस पास की परिस्थितयों का ब्यौरा करना चाहिए । नियमानुसार लड़को और लड़कियों को परीक्षा देते समय ‘सब-फस्क‘ नामक यूनिफार्म पहननी होती है जो कि दोनों लिंगों के लिए एकसमान नहीं होती ।  लड़कों के सब-फस्क में एक गाढ़े रंग का सूट, मोज़े, काले जूते, सफ़ेद शर्ट, कॉलर और बो-टाई होते हैं किन्तु  लड़कियों को एक गाढ़ी स्कर्ट (अथवा पैंट), सफ़ेद ब्लाउज (या कॉलर सहित शर्ट), काली टाई या रिबन, काली स्टॉकिंग्स व जूते तथा इच्छानुसार काला कोट पेहेन ना  होता है ।

वाक्-स्वतंत्रता पर चर्चा के अपने ब्रायन पेसुब्फूसक ल्लोट ने पाया कि युवक एवम् युव्तियों को अपनी यूनिफार्म की अदलाबदली की अनुमित नहीं है । जब पेल्लोट ने अपने जेंडर व डेवलपमेंट परीक्षा के लिए अपनी एक महिला सहपाठी के साथ अपनी यूनिफार्म बदलने का निवेदन किया तब यूनिवर्सिटी ने उसे साफ़ तौर पर “ना” कहा । प्रॉक्टर के क्लर्क ने पेल्लोट को जवाब में यह लिखा की हालांकि सब-फस्क की जेंडर-निर्भरता यूनिवर्सिटी में एक “मुख्या चर्चा का विषय है”, लेकिन अभी के लिए कुछ व्यक्ति-विशेष के लिए नियम बदलना असंभव है सिर्फ इसलिए कि वे इनसे असहमत हैं ।

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  1. Malaysia’s parenting guidelines on how to spot gays and lesbians relies as much on clothing choice as on perceived sexual orientation. What can the clothes someone chooses to wear really tell you about the person? How integral is attire to free expression?

    http://globalvoicesonline.org/2012/09/16/malaysia-parenting-guidelines-on-how-to-spot-gays-and-lesbians/

  2. This is a major issue in my research field: women’s colleges in South India. Most of them have very strict dress-codes about length of tops, types of trousers allowed, length of skirts and the wearing of sleeveless clothing. In a city where sexual harassment is rampant, it is unfortunately very easy for institutions to claim that they are looking out for women’s safety when instituting these rules.

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'वाक्-स्वतंत्रता पर चर्चा' ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के सेंट एंटनी कॉलेज में स्वतंत्रता के अध्ययन पर आधारित दह्रेंदोर्फ़ कार्यक्रम के अंतर्गत एक अनुसन्धान परियोजना है www.freespeechdebate.com

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