क्या यूरोपीय मानवाधिकार न्यायालय केवल अविवादात्मक की रक्षा कर रहा है?

उदहारण

1985 में, औट्टो परेमिंगर इन्स्टेट्यूट (OPI), एक कला घर जिसकी खासियत वैकल्पिक सिनेमा थी, ने काउन्सल इन हैवन नामक फिल्म दिखाने का निर्णय लिया। यह व्यंगपूर्ण त्रासदी से भरी फिल्म स्वर्ग की पृष्ठभूमि पर स्थित थी जिसमें दण्डदेव सैफिलिस मानवों को रिनायसांस के दौरान करे व्यभिचार व दुराचार, ख़ास तौर से पोप के दरबार में, की सज़ा मानवों को दे रहे हैं। पूरी फिल्म में ईसाई पंथ को दर्शाया गया है। संस्थान नें, जो कि टाइरौल में स्थित है, कई महत्वपूर्ण कदम, जैसे कि साफ चेतावनी देना कि फिल्म लोगों को अपमानजनक लग सकती है व कानूननुसार 17 साल से कम उम्र के लोगो का फिल्म दिखाने पर प्रतिबंध लगाना, उठाए ताकि टाइरौल की बड़ी कैथोलिक जनसंख्या गलती से फिल्म ना देख ले।

लेकिन पैहले शो से पहले ही सरकारी वकील ने संस्थान के प्रबंधक के ख़िलाफ़ रोमन कैथोलिक चर्च के इन्सबर्ग प्रांत के आग्रह पर धार्मिक आस्था को ठेंस पहुंचाने के आरोप में, जो कि आस्ट्रिया में जुर्म है, कानूनी कार्यवाही शुरू कर दी। नतीजातन, यह फिल्म ज़ब्त कर ली गई थी व उसके अधिकार छीन लिए गए थे।

यूरोपीय मानवाधिकार न्यायालय में OPI के निर्देशक ने तर्क दिया कि फिल्म का ज़ब्त करना और उसके बाद उसके अधिकार छीन लेना, ऑस्ट्रियन सरकार द्वारा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उलंग़न है जो कि यूरोपीय मानवाधिकार सभा का आर्टिकल 10 प्रदान करता है। ऑस्ट्रियन सरकार अपने तर्क पर अटल रही कि यह निर्णंय टएरौल के कैथलिक समुदाय की धार्मिक भावनाओं को हाति से बचाने के लिए व उपद्रव फैलने से रोकने के लिए लिया गया है।

न्यायालय ने ऑस्ट्रियन सरकार की तरफदारी करते हुए उसके निर्णय को उचित क़रार दिया। न्यायालय ने तर्क दिया कि इस मुकदमे में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दो मूल विरोधी हितों की तोलना की जानी है। यह हित एक तरफ अभिव्यक्ता के सार्वजनिक तौर से विवादासमक बयानो को देना व फलस्वरूप संबंधित व्यक्ति को इन विचारों से जाग्रुत कराने के अधिकार की रक्षा करता है तो वहीं दूसरी तरफ अन्य व्यक्तियों के सम्मानपूर्वक विचारों की अभिव्यक्ती, आत्मसम्मान व धर्म की रक्षा करता है। फिल्म का ज़ब्त करना और उसके बाद उसके अधिकार छीन लेने का उद्देश्य ” टाइरोलियन राज्य के लोगों के अनुसार रोमन कैथोलिक धर्म पर हो रहे अपमानजनक अक्मणों के रोकना है” व यह तथ्य कि “रोमन कैथलिक धर्म टाइरौल प्रांत में अधिक्तर लोगों का धर्म है”, इन बातों को नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता। ऑस्ट्रियीय सरकार ने यह कदम उस प्रांत में “धार्मिक शांति बनाए रखने के लिए उठाए हैं व कुछ लोगों को ऐसा ना लगे कि यह उनके धर्म पर गैर-ज़रूरी हमला है”। न्यायालय ने अंत में कहा कि क्योंकि सरकार नें फिल्म को दिखाने से रोकने का फैसला इन शंकाओं को कलाकारों की अभिव्यक्ति की आज़ादी से तोलने के बाद ही लिया है इसलिए आर्टिकल 10 का उलंघन नहीं हुआ है।

लेखक की राय

बहुसंख्य व तीन असहमत न्यायाधीशों की राय की तुलना करना काफी दिलचस्प है। वह अटल थे कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक गणतांत्रिक समाज का अभिन्न हिस्सा है। सही माएनों में, यह ना सिर्फ इन विचारों को अपने अदर रखता है जिन्हें हम अच्छे नज़रिए से देखते हैं बल्कि उन विचारों को भी रखता है जो राज्य व समाज के एक हिस्से को हैरान, उत्पीड़ित व अपमानित कर सकता है। यह एक सम्मोहक तर्क है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की कीमत के बारे में हमें सोचना पड़ेगा अगर यह सिर्फ अविवादास्प सूचना पर ही लागू होगी। संभवत ऐसी सूचना को किसी खास सुरक्षा की ज़रूरत नहीं है क्योंकि इसका सरकार या किसी व्यक्ति द्वारा विरोध करने की संभावनाएं बहुत कम हैं। निश्चित रूप से आर्टिकल 10 को विवादास्मक की रक्षा का ज़रिया समझना चाहिए। इस मामले में सबसे सटीक बात यह है कि औट्टो परेमिंगर इन्स्टेट्यूट के द्वारा लिए गए विरोधी कदमों के कारण जिन लोगों की इस फिल्म में कोई रुचि नहीं थी वह वैसे भी फिल्म नहीं देखते।

- माइकल फिन्क

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Comments (2)

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  1. Although I completely disagree with the decision of the Court and side with the dissenting opinions regarding the broad range of expressions that are covered by the right of freedom of expression (it is the way it has been understood by the Constitutional Court in Colombia, which is one of the most activist courts in the world), I do wonder at the idea of proposing a move from balancing rights to establishing rigid categorisations where some rights in every case have primacy over others. This could lead to more abuses by the state and to arbitrary decisions by courts. I would still defend the balancing of rights, although I would encourage the European Court to follow the lead of other more progressive courts.

  2. This sort of expediency is often excused by referring to the commonly-accepted and rarely challenged notion that the judges or politicians have to ‘balance’ opposing rights. It should not be a question of balancing rights – it should be a simple matter of deciding upon which rights have primacy. In this case, whilst we might wish to protect people from having their religious beliefs insulted, this should not be allowed to interfere with freedom of expression. Free speech must have primacy. If we don’t have free speech, then we can’t even properly discuss what other rights we ought to have.

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'वाक्-स्वतंत्रता पर चर्चा' ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के सेंट एंटनी कॉलेज में स्वतंत्रता के अध्ययन पर आधारित दह्रेंदोर्फ़ कार्यक्रम के अंतर्गत एक अनुसन्धान परियोजना है www.freespeechdebate.com

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