वाक्-स्वतंत्रता पर चर्चा

तेरह भाषाएँ. दस सिद्धांत. एक वार्तालाप.

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1हम सभी इंसानों को सीमाओं की परवाह करे बिना, अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए, और सूचना के आदान प्रदान के लिए पूरी तरह स्वतन्त्र और सक्षम होना चाहिए.»
2हमें इन्टरनेट और संचार के अन्य माध्यमो को निजी और सार्वजनिक शक्तियो के नाजायज़ अतिक्रमण से बचाना होगा.»
3हमें खुले और विविध संचार माध्यमो की आवश्यकता है ताकि हम सूचित निर्णय ले सकें और राजनैतिक जीवन में पूरी तरह भाग ले सकें.»
4हम सभी प्रकार के मानव अंतरो के बारे में खुलकर और सभ्यता के साथ बोलते हैं.»
5हम चर्चा और ज्ञान के प्रसार में कोई भी प्रतिबंधो की अनुमति नहीं देते»
6हम न तो हिंसा की धमकी देते हैं और न ही दूसरो से हिंसा की धमकी स्वीकार करते हैं.»
7हम हर आदमी का सम्मान करते हैं भले ही हम उनके हर विचार से सहमत न भी हो.»
8हम सब एक नीजी जीवन के हकदार है, पर जनहित में हमें किसी भी प्रकार की जांच के लिए तैयार रहना चाहिए.»
9हमें किसी भी मुद्दे पर बहस को संकुचित किये बगैर अपनी प्रतिष्ठा की रक्षा करने की क्षमता क्षमता होनी चाहिए.»
10हमें राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था और नैतिकता के आधार पे मुक्त अभिव्यक्ति पर लगायी गई सभी सीमाओं को चुनौती देने के लिए स्वतंत्र होना चाहिए.»

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मुख्य (होम) | मामले का अध्ययन | जापान की नई इतिहास पाठ्यपुस्तक का विवाद

जापान की नई इतिहास पाठ्यपुस्तक का विवाद

आयको कोमीन और नाओको होसोकावा लिखते है कि इतिहास की एक पाठ्यपुस्तक जो कि जापानी साम्राज्यवाद को संयत अभिनय करती है घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर में विवाद का कारण हुई।

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AFP PHOTO / TOSHIFUMI KITAMURA (Photo credit should read TOSHIFUMI KITAMURA/AFP/Getty Images)

उदहारण

नई इतिहास पाठ्यपुस्तक (अताराशी रेकिशी क्योकाशो) शीर्षक की एक पाठ्यपुस्तक एक रूढ़िवादी विद्वानों की समिति द्वारा 2000 में प्रकाशित किया गया और इस पाठ्यपुस्तक को जूनियर हाई स्कूलों के लिए एक सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक के रूप में शिक्षा के मंत्रालय द्वारा 2001 में अनुमोदित किया गया था। यह विवाद की वजह बन गयी और दोनों घरेलू और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसको लेकर बहुत बहस हुई, विशेष रूप से चीन और कोरिया जैसे पड़ोसी देशों के संबंध में और इन देशो के साथ के जापानी राजनयिक संबंध प्रभावित हुए। पाठ्यपुस्तक के लिए सरकारी अनुमोदन विवादास्पद रूप में देखा गया था क्योंकि वह चीन – जापान युद्ध और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापान की आक्रामकता को संयत अभिनय करता है। लेकिन वास्तविकता  में यह नई इतिहास पाठ्यपुस्तक जापान में केवल कुछ स्कूलों द्वारा अपनाया गया है।

लेखक की राय

1990 के दशक में हमारे जापानी जूनियर हाई स्कूल की पाठ्यपुस्तक में आराम महिलाए मौजूद थी और जापानी साम्राज्यवाद आक्रामकता का एक अधिनियम था। जो इस पाठ्यपुस्तक द्वारा प्रस्तुत किया गया है वह जापान के राष्ट्रीय इतिहास के बारे में हमारी समझ के कोसो दूर है लेकिन दुसरे इसकी सच्चाई की तियोगिता हम से बेहतर कर सकते हैं।

इसके बजाय हम यह सोचना चाहते है कि कैसे राजनीति हमेशा अतीत के बारे में लिखने के मामले में फंस जाता है, या इस विशिष्ट उदाहरण में, नए सिरे से अतीत के बारे में लिखने में, और अतीत के बारे में नहीं लिखने के मामले में। यह एक तुच्छ तथ्य नहीं है कि इस पाठ्यपुस्तक के प्रकाशन से पहले अस्थिरता का दौर था, जिसके दौरान लंबे समय अवलंबी लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी ने अपने कुछ दक्षिणपंथी सदस्यों पर नियंत्रण खो दिया था। उस ही समय पर यह पाठ्यपुस्तक बहुत कम स्थानीय स्कूल बोर्डों द्वारा अपनाया गया था क्योंकि काफी बड़ी संख्या में चिन्तित नागरिकों ने इसके इस्तेमाल के खिलाफ आवाज़ उठाई थी। एक तरह से, अधिक आवाज़े और उन आवाजों को व्यक्त करने का माध्यम जापान में मौजूद था जो की मुक्त भाषण को सक्षम बनाने वाले संस्थानों वाले देश में होना चाहिए।

इस गर्म विवाद के जवाब में, 2002 में, जापान, चीन और दक्षिण कोरिया ने इतिहास की पाठ्यपुस्तकों की सामग्री पर एक संयुक्त अनुसंधान समिति का गठन किया था। इस समिति को तीन देशों के इतिहास और पाठ्यपुस्तक पर अपने विचारों का आदान प्रदान करने के लिए एक मंच के होने की उम्मीद थी। विवाद उसके बाद समाप्त हो गया। समिति ने आज भी अपनी गतिविधियों को जारी रखा है और इसने इतिहास के कई संदर्भ पुस्तकें विशेषज्ञों के बीच विचार – विमर्श से लेकर और प्रत्येक देश की राय को शामिल करके प्रकाशित करी है। परन्तु एक स्कूल पाठ्यक्रम के लिए निर्मित ग्रंथों में विदेश से आवाज को सही ढंग से दर्शाने में निहित बाधाएं हैं जब वे राष्ट्रीय ऐतिहासिक वर्णन के प्रसार के लिए साइटों में से एक है और खासकर कि जब इनका अपने पड़ोसियों के वर्णन के साथ संघर्ष है।

अंततः यह विवाद एक बुनियादी सवाल उठाती है जो की लिबरल लोकतंत्र और राष्ट्र – राज्य की प्रकृति के दिल को जाता है। क्या एक राज्य को अपनी राष्ट्रीय सीमाओं से परे लोगों की आवाज के प्रति जवाबदेह होना चाहिए?

 

- आयको कोमीन और नाओको होसोकावा
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पर प्रकाशित: जुलाई 13, 2012 | पहली टिप्पणी आप करें

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'वाक्-स्वतंत्रता पर चर्चा' ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के सेंट एंटनी कॉलेज में स्वतंत्रता के अध्ययन पर आधारित दह्रेंदोर्फ़ कार्यक्रम के अंतर्गत एक अनुसन्धान परियोजना है. www.freespeechdebate.com